क्यों हुआ है हनुमान का उग्र रुप

jai hanuman

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भारतीय शास्त्र के अनुसार शनि एक ऐसा ग्रह है जिसके प्रकोप से इंसान के साथ साथ भगवान भी नहीं बच पाए हैं। लेकिन एक बार कुछ ऐसा हुआ कि स्वयं शनि ऐसे फंसे कि उस समस्या से निजात पाना शनि जैसे क्रूर ग्रह के लिए भी मुश्किल पड़ गया।

कथा बेहद रोचक है और इस कहानी की कड़ियां जुड़े हैं रामायण काल (सतयुग) से। ये तो सभी जानते हैं कि राम की लंका विजय में उनके भक्त वीर हनुमान और उनकी पराक्रमी वानर सेना का बहुत बड़ा योगदान रहा लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि राम-रावण युद्ध में एक वक्त ऐसा भी आया था जब श्रीराम एक पल के लिए घबरा गए थे उनकी आंखो से आंसू झलक पड़े थे।

एक बार राम-रावण के युद्ध के दौरान रावण के बेटे मेघनाथ ने वानर सेना को काफी नुकसान पहुंचाया। मेघनाथ से निपटने के लिए लक्ष्मण ने मोर्चा संभाला। लक्ष्मण और मेघनाथ में भीषण युद्ध हुआ।तमाम कोशिशों के बावजूद जब मेघनाथ ने देखा कि लक्ष्मण उस पर भारी पड़ रहे हैं। तब मेघनाथ ने लक्ष्मण पर शक्ति बाण चला दिया।

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शक्ति बाण लगते ही लक्ष्मण मूर्छित हो गए। वानर सेना घबरा गयी। स्वयं श्री राम भी विचलित हो उठे। श्रीराम को शोकाकुल देख जाम्बवान ने श्रीराम को बताया कि लंका में सुषेन नाम के वैद्य रहते हैं और वो लक्ष्मण को मूर्छित अवस्था से निकालने का उपाय बता सकते हैं।

ऐसे में हनुमान जी ने दुश्मन के स्थान लंका में जाने की जिम्मेदारी ली और हनुमान जी वैद्य को उनके मकान समेत उठा ले आए और श्रीराम के सामने लाकर खड़ा कर दिया। वैद्य ने लक्ष्मण की हालत देखने के बाद सुझाव दिया कि अगर कोई सुबह होने से पहले द्रोनाचल पर्वत से संजीवनी बूटी ले आए तो लक्ष्मण के प्राण बच सकते हैं।

द्रोनाचल पर्वत काफी दूर था और समय भी कम था ऐसे में ये काम भी सिर्फ हनुमान ही कर सकते थे। हनुमान जी ने वैद्य से संजीवनी बूटी के बारे में पूरी जानकारी ली और द्रोनाचल के लिए उड़ान भर ली। लेकिन जैसे ही वो पर्वत पर पहुंचे तो उन्हें सभी बूटियां संजीवनी की तरह ही लगी और उन्होंने पूरे के पूरे पहाड़ को ही उठा ले जाने का फैसला किया।

रावण को जब इस बात कि भनक पड़ी तो उसने हनुमान को रोकने के लिए शनि को आदेश दे दिया कि किसी भी हाल में हनुमान को वो बूटी लक्ष्मण तक पहुंचाने से रोका जाए। हर हाल में सुबह होने से पहले बूटी को लेकर पहुंचना था। ऐसे में हनुमान जी ने अपनी पूरी ताकत के साथ शनि का सामना किया और शनि को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया।

यही नहीं शनि को उन्होंने अपने पांव तले बुरी तरह से दबा दिया अपनी ऐसी हालत देख शनि के सामने कोई रास्ता न बचा और औरों को अपने प्रकोप से भस्म करने वाले शनि खुद अपने आपको लाचार पाकर हनुमान के आगे झुकने को मजबूर हो गए। वेद पंडित पुरुषोत्तम शास्त्री के मुताबिक शनि ने हनुमान जी से अपने आप को छोड़ने का अनुरोध किया लेकिन हनुमान जी ने एक शर्त रख दी कि मैं तुम्हें तभी छोड़ूंगा जब आप एक वरदान दे देंगे कि प्रभु राम का नाम जपने वाले हर प्राणि को आप अपने बुरे प्रभाव से दूर रखेंगे।

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