आखिर क्यों परशुराम ने अपने गुरु महादेव शिव से किया युद्ध, भगवान शिव द्वारा दिए गए फरसे से उन्हें ही पहुंचाई चोट !

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परशुराम जी ने हैहयवंशी क्षत्रियो का वध किया था यह कथा तो सर्वविदित ही है, समंतपंचका में परशुराम जी ने अंतिम युद्ध लड़ा था. यही पर परशुराम जी ने हजारो क्षत्रियो का वध किया था तथा उनके खून से पांच तालाब भर दिए थे. तथा इसके बाद परशुराम जी ने अपना रक्तरंजित परशु धोया एवं शस्त्र नीचे रखे थे. संहार और हिंसा से वे थक चुके थे.

परशुराम ने 21 बार अभियान चला कर धरती के अधिकांश राजाओ को जीत लिया था, बहुत से राजाओ ने उनसे भयभीत होकर उनकी शरण ले ली थी. कुछ ने रनिवासों में छुपकर जान बचाई थी कुछ राजाओ ने ब्राह्मणो से आश्रय लिया था तथा उनकी कुटिया में छुपकर अपनी जान बचाई थी.

पृथ्वी के सातो द्वीपों पर अब परशुराम का एकछत्र राज था. एक तरह से पूरी पृथ्वी क्षत्रियो से वहीं हो चुकी थी. परशुराम के सभी उद्देश्य पुरे हो चुके थे. भूमण्डल के सभी राज्यों को जीत जाने के कारण उन्हें अश्व्मेध्य यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त हो चुका था .

ऐसे में परशुराम ने पितरो को दिए अपने वचन को पूरा करने की सोची. खून से भरे तालाबों से निकलकर परशुराम ने अपने पितरो को अपने शत्रुओ के रक्त का अध्र्य दिया तो उनके पूर्वज उनके सामन उपस्थित हो गए.

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