जाने राक्षसों से जुडी कभी न कहि गई व सुनी गई रोचक बाते तथा कौन थे रामायण काल के 10 सर्वशक्तिमान राक्षस !

प्राचीनकाल में सुर, असुर, देव, दानव, दैत्य, रक्ष, यक्ष, दक्ष,किन्नर, निषाद, वानर, गंधर्व, नाग आदि जातियां होती थीं. राक्षसों को पहले‘रक्ष’ कहा जाता था. ‘रक्ष’ का अर्थ, जो समाज की रक्षा करें. राक्षस लोग पहले रक्षा करने के लिए नियुक्त हुए थे, लेकिन बाद में इनकी प्रवृत्तियां बदलने के कारण ये अपने कर्मों के कारण बदनाम होते गए और आज के संदर्भ में इन्हें असुरों और दानवों जैसा ही माना जाता है.

पुराणों के अनुसार मह्रिषी कश्यप की पत्नी सुरसा ने सबसे पहले राक्षस पुत्र यातुधान को जन्म दिया था. यातुधान से ही राक्षस वंश का आरम्भ हुआ था. लेकिन एक दूसरी कथा के अनुसार सृष्टि के रचियता ब्र्ह्मा जी ने समुद्रगत जल तथा इसमें रहने वाले प्राणियों की रक्षा के लिए कुछ प्राणियों को उतपन्न किया. उन में जिन प्राणियों ने रक्षा की जिम्मेदारी संभाली वे राक्षस कहलाए तथा जिन्होंने यक्षण ( पूजन ) की जिम्मेदारी ली वे यक्ष कहलाए. जल की रक्षा करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए ये जाती पवित्र मानी जाती थी.

राक्षसों का प्रतिनिधित्व इन दो लोगो को सौंपा गया हेति और प्रहेति, ये दोनों ही भाई थे तथा पराक्रम और ताकत में दो दैत्यों मधु एवं कैटभ के ही समान थे. हेति धर्मात्मा था तो प्रहेति को राजपाट एवं राजनीती में ज्यादा रूचि थी.

रामयाण काल में जहाँ विचित्र प्रकार के पशु पक्षी होते थे वही उस काल में राक्षसों का आतंक भी ज्यादा बढ़ गया था. राक्षसों को मायावी शक्तियों का ज्ञान था तथा वे अपनी इन शक्तियों का प्रयोग द्वारा देवताओ एवं मनुष्यो को आतंकित करने लगे. रामायणकाल में संपूर्ण दक्षिण भारत और दंडकारण्य क्षेत्र (मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़) पर राक्षसों का आतंक था. दंड नामक राक्षस के कारण ही इस क्षेत्र का नाम दंडकारण्य पड़ा था.

आइये जानते है रामायण काल के उन 10 राक्षसों के बारे में जो उस काल में अपनी शक्तियों के कारण प्रसिद्ध थे.

पहले राक्षस ‘हेति’ और ‘प्रहेति’ : राक्षसों का प्रतिनिधित्व दो लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’ और ‘प्रहेति’. ये दोनों भाई थे. हेति ने अपने साम्राज्य विस्तार हेतु ‘काल’ की पुत्री ‘भया’ से विवाह किया. भया से उसके विद्युत्केश नामक एक पुत्र का जन्म हुआ. उसका विवाह संध्या की पुत्री ‘सालकटंकटा’ से हुआ. माना जाता है कि ‘सालकटंकटा’ व्यभिचारिणी थी. इस कारण जब उसका पुत्र जन्मा तो उसे लावारिस छोड़ दिया गया. विद्युत्केश ने भी उस पुत्र की यह जानकर कोई परवाह नहीं की कि यह न मालूम किसका पुत्र है. बस यहीं से राक्षस जाति में बदलाव आया….

शिव और मां पार्वती की उस अनाथ बालक पर नजर पड़ी और उन्होंने उसको सुरक्षा प्रदान ‍की. उस अबोध बालक को त्याग देने के कारण मां पार्वती ने शाप दिया कि अब से राक्षस जाति की स्त्रियां जल्द गर्भ धारण करेंगी और उनसे उत्पन्न बालक तत्काल बढ़कर माता के समान अवस्था धारण करेगा. इस शाप से राक्षसों में शारीरिक आकर्षण कम, विकरालता ज्यादा रही. शिव और पार्वती ने उस बालक का नाम ‘सुकेश’ रखा. शिव के वरदान के कारण वह निर्भीक था. वह निर्भीक होकर कहीं भी विचरण कर सकता था. शिव ने उसे एक विमान भी दिया था.

सुकेश के तीन पुत्र :- सुकेश ने गन्धर्व कन्या देववती से विवाह किया. देववती से सुकेश के तीन पुत्र हुए माल्यवान, सुमाली और माली. इन तीनो के कारण राक्षस जाती को विस्तार और प्रसिद्धि प्राप्ति हुई. इन तीनों भाइयों ने शक्ति और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी की घोर तपस्या की. ब्रह्माजी ने इन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और तीनों भाइयों में एकता और प्रेम बना रहने का वरदान दिया. वरदान के प्रभाव से ये तीनों भाई अहंकारी हो गए.

तीनों भाइयों ने मिलकर विश्वकर्मा से त्रिकूट पर्वत के निकट समुद्र तट पर लंका का निर्माण कराया और उसे अपने शासन का केंद्र बनाया. इस तरह उन्होंने राक्षसों को एकजुट कर राक्षसों का आधिपत्य स्थापित किया और उसे राक्षस जाति का केंद्र भी बनाया.

लंका को उन्होंने धन और वैभव की धरती बनाया और यहां तीनों राक्षसों ने राक्षस संस्कृति के लिए विश्व विजय की कामना की. उनका अहंकार बढ़ता गया और उन्होंने यक्षों और देवताओं पर अत्याचार करना शुरू किया जिससे संपूर्ण धरती पर आतंक का राज कायम हो गया.

इन्हीं तीनों भाइयों के वंश में आगे चलकर राक्षस जाति का विकास हुआ. तीनों भाइयों के वंशज में माल्यवान के वज्र, मुष्टि, धिरूपार्श्व, दुर्मख, सप्तवहन, यज्ञकोप, मत्त, उन्मत्त नामक पुत्र और अनला नामक कन्या हुई.

सुमाली के प्रहस्त, अकन्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राश, दण्ड, सुपार्श्व, सहादि, प्रधस, भास्कण नामक पुत्र तथा रांका, पुण्डपोत्कटा, कैकसी, कुभीनशी नामक पुत्रियां हुईं. इनमें से कैकसी रावण की मां थीं. माली रावण के नाना थे. रावण ने इन्हीं के बलबूते पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया और शक्तियां बढ़ाईं.

माली के अनल, अनिल, हर और संपात्ति नामक 4 पुत्र हुए. ये चारों पुत्र रावण की मृत्यु पश्चात विभीषण के मंत्री बने थे. रावण राक्षस जाति का नहीं था, उसकी माता राक्षस जाति की थी लेकिन उनके पिता यक्ष जाति के ब्राह्मण थे.

रावण :- माली की पुत्री कैकसी रावण की माता थीं. रावण का अपने नाना की ओर झुकाव ज्यादा था इसलिए उसने देवों को छोड़कर राक्षसों की उन्नति के बारे में ज्यादा सोची. रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्मज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था. राक्षसों के प्रति उसके लगाव के चलते उसे राक्षसों का मुखिया घोषित कर दिया गया था. रावण ने लंका को नए सिरे से बसाकर राक्षस जाति को एकजुट किया और फिर से राक्षस राज कायम किया. उसने लंका को कुबेर से छीना था. परन्तु कुछ कथाओ के अनुसार कहा जाता है की रावण को लंका भगवान शिव से प्राप्त हुई थी. रावण को सम्मोहन, तंत्र मन्त्र एवं बहुत सी विद्याओं का ज्ञान था.

कालनेमि – कालनेमी रावण का विश्वस्त अनुचर था , वह अति भयंकर एवं मायवी था. इसकी प्रसिद्धि रामायण काल में दूर-दूर तक फैली थी. रावण ने इसी कारण उसे एक कठिन कार्य सौंपा था.
जब राम रावण युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति लगी थी तब हनुमान उनकी मूर्छा को तोड़ने के लिए संजीवनी बूटी लेने गए थे. उसी दौरान कालनेमि ने उन्हें अपने छल में फसा लिया था. मायवी कालनेमि कुछ देर के लिए हनुमान को अपने छल में फ़साने में कामयाब रहा परन्तु अंत में हनुमान जी ने उसके चाल को समझकर उसका वध कर दिया.

कबंध :- सीता की खोज में लगे राम एवं लक्ष्मण को दण्डक वन में एक अजीब सा विचित्र दानव दिखा जिसका न तो सर था और ना ही गला. उसकी केवल एक आँख ही नजर आ रही थी. उस विचित्र दैत्य का नाम था कबंध. राम लक्ष्मण के द्वारा इस दैत्य का भी उधार हुआ. अंत समय ने कबंध ने बताय की वह दनु का पुत्र है तथा पहले वह बहुत ही सुन्दर एवं पराक्रमी राजकुमार था. राक्षसों जैसी भीषण आकृति बनाकर वह ऋषि मुनियों को डराया करता था इसी कारण उसकी यह दूरदशा हुई.

सुबाहु :- ताड़का के पिता का नाम सुकेतु यक्ष और पति का नाम सुन्द था. सुन्द एक राक्षस था इसलिए यक्ष होते हुए भी ताड़का राक्षस कहलाई. अगस्त्य मुनि के शाप के चलते इसका सुंदर चेहरा कुरूप हो गया था इसलिए उसने ऋषियों से बदला लेने की ठानी थी. वह आए दिन अपने पुत्रों के साथ मुनियों को सताती रहती थी.

ताड़िका में हजार हाथियों के समान बल था उसके कारण ही सुण्डार वन को ताड़िका वन कहा जाता था. सुबाहु भी ताड़िका के समान ही बलशाली था वे दोनों मिलकर ऋषियों के आश्रम में उत्पाद मचाते थे. अंत में भगवान श्री राम ने विश्वामित्र के आदेश पर उन दोनों का वध किया.

मारीच :- राम के तीर से बचने के बाद ताड़का पुत्र मारीच ने रावण की शरण ली. मारीच लंका के राजा रावण का मामा था. जब शूर्पणखा ने रावण को अपने अपमान की कथा सुनाई तो रावण ने सीताहरण की योजना बनाई. सीताहरण के दौरान रावण ने मारीच की मायावी बुद्धि की सहायता ली.

रावण महासागर पार करके गोकर्ण तीर्थ में पहुंचा, जहां राम के डर के कारण मारीच छिपा हुआ था. वह रावण का पूर्व मंत्री रह चुका था. जब रावण ने मारीच को अपनी योजना बताई तो मारीच ने ऐसा करने से मना कर दिया परन्तु बाद में जब रावण अपने बल का भय दिखाया तो मारीच को चाहते हुए राम के कुटिया के सम्मुख सोने का मृग बनकर जाना पड़ा. भगवान राम ने अपने एक तीर से सोने का मृग समझ मारीच का वध किया था.

विराध :- वनवास के दौरान राम, सीता तथा लक्ष्मण दण्डक वन से होते हुए गुजरे. रास्ते में अनेक आश्रम पड़ रहे थे परन्तु जैसे ही उन्होंने वह क्षेत्र पार किया उसके बाद उन्हें भयंकर सा वन मिला. जहाँ अनेक प्रकार के अजीब जीव थे. तभी विराध नामक राक्षस ने उन्हें रोका तथा माता सीता को उसके हवाले करने की बात कहि. तब राम लक्ष्मण दोनों ने उस राक्षस के साथ भयंकर युद्ध किया. क्योकि उस राक्षस को ब्र्ह्मा जी से वरदान प्राप्त था की कोई भी उसे नहीं मार सकता अतः भगवान राम एवं लक्ष्मण ने उसे हर जगह से घायल कर दिया तथा इसके पश्चात उसे जमीन के अंदर दफना दिया ताकि वह अन्य राहगीरों को परेशान न कर सके.

अहिरावण :- अहिरावण एक असुर था तथा वह रावण का परम मित्र था. रावण के कहने पर ही वह पाताल लोक से धरती लोक पर आया तथा भगवान राम सहित लक्ष्मण का भी अपहरण कर लिया. अंत में हनुमान जी ने प्रभु राम एवं लक्ष्मण को अहिरावण के कैद से मुक्त किया तथा अहिरावण का वध किया.

कुंभकर्ण :- यह रावण का भाई था, जो 6 महीने बाद 1 द‌िन जागता और भोजन करके फ‌िर सो जाता, क्‍योंक‌ि इसने ब्रह्माजी से न‌िद्रासन का वरदान मांग ल‌िया था. युद्ध के दौरान क‌िसी तरह कुंभकर्ण को जगाया गया. कुंभकर्ण ने युद्घ में अपने व‌िशाल शरीर से वानरों पर प्रहार करना शुरू कर द‌िया इससे राम की सेना में हाहाकार मच गया.सेना का मनोबल बढ़ाने के ल‌िए राम ने कुंभकर्ण को युद्घ के ल‌िए ललकारा और भगवान राम के हाथों कुंभकर्ण वीरगत‌ि को प्राप्त हुआ.

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