शिव पुराण की इस कथा में छुपा है यह रहस्य, आखिर क्यों लगाते है महादेव शिव “भष्म” !

Shiv ka rahasya- शिव का रहस्य – शिव पुराण कथा – शिवलिंग का रहस्य- भगवान शिव की उत्पत्ति

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शिव का रहस्य – शिव पुराण कथा:

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देवाधिदेव महादेव शिव भारतीय संस्कृती धर्म और दर्शन को जीवन शक्ती प्रदान करनेवाले एकमात्र ऎसे देवता है जिन्हे युगों से पुजा जा रहा है. संसार के रचना में भगवान शिव की भूमिका संहारकर्ता के रूप में है. संहारकर्ता से अभिप्राय संसार को समाप्त करने से नहीं है बल्कि संसार की रचना से है.

जब इस सृष्टि में पाप बढ़ जाता है और धर्म की हानि होने लगती है तब महादेव शिव इस संसार से समस्त पापियों का नाश करके एक बार फिर से नए संसार के सृजन का मार्ग खोल देते है.

यदि हम महादेव शिव के भक्तो की बात करें तो भगवान शिव के भक्त संसार के सभी मोह माया से विरक्त होते है वे सिर्फ भोलेनाथ की भक्ति में मग्न रहते है.

ध्यान देने वाली बात यह है शिव के द्वारा धारण की जाने वाले हर प्रतीक के प्रति वे भक्ति का भाव रखते है. वही दूसरी तरफ भगवान शिव के द्वारा धारण किये जाने वाले हर प्रतीक के पीछे कोई ना कोई रहस्य व कथा जरूर छुपी होती है.

आपने यह अधिकतर देखा होगा की भगवान शिव की पूजा में राख या भस्म को प्रयोग में लाया जाता है यहाँ तक की भगवान शिव के भक्त भी भष्म को अपने सर में तिलक के रूप में लगाते है.

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक तथा भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिर में से एक महाकालेश्वर मंदिर में भगवान शिव के शिवलिंग की आरती हर रोज सुबह-शाम राख या भष्म के साथ की जाती है. लेकिन क्या आप इसके महत्व को जानते है.

हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ग्रन्थ ”शिव पुराण” में महादेव के भष्म से लगाव के संबंध में कथा मिलती है.

शिव पुराण के अनुसार जब महादेव शिव की पत्नी सती ने अग्नि में समर्पित कर दिया था तो उनकी मृत्यु का संदेश पाकर भगवान शिव क्रोध एवं दुःख में अपना मानसिक संतुलन खो बैठे. वे अपनी पत्नी के मृत शव को लेकर इधर-उधर घूमने लगे, कभी आकाश पर तो कभी धरती पर.

जब श्री हरी ने शिव के इस उत्तेजित एवं दुखी व्यवहार को देखा तो उन्होंने शीघ्र से शीघ्र कोई हल निकालने की कोशिश करी. अंततः उन्होंने भगवान शिव की पत्नी के मृत शरीर को सपर्श कर भष्म में बदल दिया.

हाथो में केवल पत्नी की भष्म को देख शिवजी और भी अधिक चिंतित हो गए, उन्हें लगा की वे अपनी पत्नी को हमेशा के लिए खो चुके है.

अपनी पत्नी से अलग होने के दुःख को भगवान शिव सहन नहीं कर पा रहे थे, लेकिन उस समय उनके हाथो में उनके पत्नी के शरीर के भष्म के अलावा और कुछ भी नहीं था.

इसलिए उन्होंने उस भष्म को अपनी पत्नी की आखरी निशानी मानते हुए अपने तन पर मल लिया. ताकि सती भष्म के कणो के जरिये सदैव उनके साथ ही बने रहे.

दूसरी ओर एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने साधुओं को संसार और जीवन का वास्तविक अर्थ बताया था. जिसके अनुसार राख ही सम्पूर्ण संसार का अंतिम सत्य है.

सभी तरह की मोह माया और शारीरिक आकर्षण से हटकर ही इस जीवन की मुख्य लक्ष्य मोक्ष को पाया जा सकता है.

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