जब कुंती और गंधारी के समक्ष महादेव शिव ने रखी एक अनोखी शर्त, महाभारत की अनकही कथा !

कृष्ण निराश होकर लौट चुके हैं, संधि प्रस्ताव असफल हो चुका है . महाभारत का युद्ध टालने की सारी कोशिशें जब बेकार साबित हो गई तो अब सिवाय इसके कोई चारा नही बचा कि युद्ध की तैयारियां की जाये . प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने स्तर पर मशगूल हो गया. अब कोई भी उपाय नही बचा कि इस विभीषिका से बचा जा सके . गांधारी और कुंती भी अपने अपने स्तर पर तैयारियों में सलंग्न हो गई .

दोनों ही , गांधारी और कुंती, राजमहल के पीछे दूर जंगल में बने शिव मन्दिर में राजोपचार विधि से, अपने अपने पुत्रो को राज्य दिलवाने की कामना से शिव पूजन करने लगी . कुछ दिन पश्चात भगवान् भोलेनाथ दोनों पर ही प्रशन्न हो गए और वर मांगने के लिए कहा . दोनों ही माताओं ने अपने अपने पुत्रो के लिए राज्य माँगा .

भगवान् शिव बोले – यह असंभव है . राज्य एक है तो दोनों को नही मिल सकता . एक काम करो एक पक्ष राज्य ले लो और दूसरा मोक्ष ले ले . आप लोग आपस में निर्णय कर लीजिये .

इस पर गांधारी बोली – हे महदेव शिव, मैं मोक्ष लेकर क्या करूंगी ? मेरे लिए तो मेरे पुत्र ही सबकुछ है. मेरे पुत्रो को शुरू से ही राज्य करने की आदत रही है . बिना राज्य के इतने बड़े कुनबे का पालन पोषण नही हो सकता .

आप एक काम करिए की राज्य तो मेरे पुत्रो को दे दीजिये और मोक्ष इनको दे दीजिये . इनको जंगलो में भटकने की आदत भी है . कोई ज्यादा परेशानी भी इन्हे नही होगी .

अब कुंती बोली – भोलेनाथ , इनके पुत्रो ने हमेशा राज्य किया है अब थोडा बहुत राज्य सुख मुझे और मेरे पुत्रो को भी मिलना चाहिए . इनके पुत्रों ने तो सब सुख देख लिया अब इन्हे मोक्ष और मुझे मेरे बेटो के लिए राज्य दीजिये भगवन .

भोले नाथ ने उन दोनों को काफी समझाया पर विवाद और बढ़ता चला गया . जब महादेव को लगा की इस विवाद का कोई परिणाम नहीं निकलना वाला तो उन्होंने गांधरी एवं द्रोपदी के समक्ष शर्त रखी . जब तुम दोनों ही मानने को तैयार नही हो तो अब वरदान सशर्त कर देता हूँ .

अब कल के अरुणोदय से पूर्व जो भी हाथी पर बैठ कर आयेगी और एक हजार स्वर्ण कमलो से मेरा अभिषेक करेगी उसी को राज्य मिलेगा . और इतना कह कर बिना कुछ सुने ही शिव बाबा वहाँ से अंतर्धान हो गए .

गांधारी ने आकर दुर्योधन को बताया और दुर्योधन ने सारे सुनारों को लगा दिया स्वर्ण कमल बनाने में और हाथियों की कोई कमी नही थी . यानी गांधारी को कोई समस्या ही नही थी
कुंती ने सोचा – भोले बाबा भी समर्थ की ही सहायता करते हैं .

भोले बाबा को मालुम है की मेरे पास एक हजार स्वर्ण कमल तो क्या एक का भी बंदोबस्त नहीं हो सकता और हाथी तो क्या हमारे पास गधा भी नही है फ़िर इस शर्त का क्या मतलब . सीधे कह देते की राज्य गांधारी का. इसी तरह कुंती के मन में अनेक क्षोभ-विक्षोभ उठ रहे थे की इतने में अर्जुन आ गए . अर्जुन ने माँ से उदासी का कारण पूछा तब माँ ने सारा किस्सा बताया .

अर्जुन ने माँ से कहा – माँ आप आराम से अब शयन करो . कल सुबह आप निर्धारित समय पर यह पूजा करने जा रही हो . कुंती उस समय आश्चर्य में अर्जुन की मुंह के तरफ देखने लगी.

इसके बाद अर्जुन ने एक पत्र में संदेश लिखा था उसे अपने भ्राता भीम को देते हुए बोले आप इसे शीघ्र अति शीघ्र इंद्र देव के पास स्वर्ग लेकर जाये. हमारा एक एक पल बहुत कीमती है अतः आप मध्य मार्ग में भोजन आदि में अपना समय व्यर्थ मत करना. और द्वारपाल को अपना परिचय देने में समय व्यर्थ किये बिना सीधे स्वर्गलोक पहुंच यह पत्र इंद्र देव को दे देना. तथा उनका वाहन ऐरावत हाथी वहां से लेकर आना.

इसके बाद अर्जुन बोले की में अलकापुरी में महाराज कुबेर के पास जाकर उनसे एक हजार स्वर्ण के कमल पुष्प लेकर आता हु.

तब अर्जुन ने अपने बाणों से पृथ्वी से स्वर्गलोक तक के लिए मार्ग बना दिया जिसमे चलकर भीम इंद्रलोक पहुंचे तथा अर्जुन कुबेर के महल. अति शीघ्रता में भीम ने द्वारपालों के उनका परिचय पूछने पर भी कोई जवाब नहीं दिया तथा हड़बड़ी में सीधे इंद्रलोक के महल के भीतर जा घुसे.

इंद्र के हाथ में भीम ने अर्जुन द्वारा भेजा संदेश पात्र पकड़ाया तथा इंद्र देव से बोले ” बता तेरा ऐरावत हाथी कहा है, में उसे अभी यहाँ से ले जाने आया हु”

भीम के मुंह से इस तरह के असम्मानजनक शब्द को सुनकर इंद्र देव क्रोध से आग बबूला हो उठे, परन्तु वे भली भाँति जानते थे की भीम से शत्रुता मोल लेना बेकार है क्योकि भीम में 1000 हाथियों के बल के बराबर समार्थ्य है.

अतः भीम को टालने के लिए इंद्र देव उनसे बोले की तुम ऐरावत को स्वर्गलोक से नहीं ले जा सकते क्योकि ऐरावत हाथी का जो महावत है वह किसी कार्य से स्वर्गलोक से प्रस्थान कर चुका है. अतः जब तक वह आता नहीं तुम्हे यहाँ उसका इन्तजार करना पड़ेगा.

इंद्र देव मन में सोच रहे थे की ऐरावत को सिर्फ में ही अपने मन से चला सकता हु अन्य कोई व्यक्ति इसके पास तक नहीं आ सकता. ऐरावत जब अपने पांच सूंडों से फुफकारता है तो हर कोई भयभीत हो जाता है. इसके साथ ही जब ऐरावत का कोई महावत है ही नहीं तो आएगा कौन तथा जब भीम इंतजार करते हुए थक जायेगा तो वह खुद ही स्वर्गलोक से चला जायेगा.

जब भीम से सहन नहीं हुआ तो उन्होंने वे इंद्र देव से बोले की मुझे विलम्ब हो रहा है अतः मुझे यह बताओ की तुम्हारा ऐरावत कहा है में खुद उसे लेकर जाता हु. इसके बाद इंद्र देव के पास कोई अन्य चारा नहीं था सिवाय भीम को यह बताने की की ऐरावत कहा स्थित है.

इसके बाद भीम ऐरावत के पास गए तथा उसके दो आगे के टाँग पकड़े तथा दो पीछे के व उसे अपने कंधे में डाल पृथ्वीलोक की और चल दिए. भीम के पराक्रम को देख इंद्र सहित सभी देव आश्चर्यचकित रह गए. उधर अर्जुन भी अलकापुरी से 1000 ब्रह्म कमल लेकर पृथ्वी में वापस आ गए.

अगले दिन प्रातः काल शीघ्र ही माता कुंती ऐरावत में सवार होकर शिव मंदिर आई तथा उन्हें एक हजार स्वर्ण कमल भगवान शिव को चढ़ा दिए. उधर हस्तिनापुर में मनुष्यो द्वारा स्वर्ण कमल निर्मित करने के कारण गांधारी को पूजा में विलम्ब हो गया.

परन्तु जब वह हाथी में बैठ मनुष्य द्वारा निर्मित छोटे से स्वर्ण कमल के पुष्पों को लेकर शिव मंदिर पहुंची तो उन्होंने वहां पहले से ही भगवान शिव पर चढ़े एक हजार स्वर्ण कमल चढ़े देखे. गांधारी समझ गई की कुंती को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त हो चुका है.

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