जाने भैरवनाथ से जुड़े आश्चर्यचकित कर देने वाले रहस्य !

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भैरव नाथ के नाम से अभिप्राय है, जो मनुष्य को उसके भय अथवा डर से मुक्ति प्रदान करे वह भैरव है. इसी के साथ भैरवनाथ के नाम से एक और अर्थ जुड़ा है, जिसका शब्द भारी भीषण हो तथा जो दिखने में भयानक प्रतीत होता हो. इसके अलावा वे घोर विनाश करने वाले उग्रदेव के नाम से भी जाने जाते है.

काल भैरव जी माता जगदम्बा के अनुचर कहे जाते है, माता जगदम्बा के दूसरे अनुचर हनुमान जी है. भैरव नाथ जी संसार के प्राणियों का दुखो का हरण कर भरण करते है. ऐसा कहा जाता है की भैरवनाथ के नाम के तीन शब्दों में ब्र्ह्मा, विष्णु तथा शिव तीनो की शक्तियां समाहित है. भैरवनाथ को माता पार्वती का अनुचर भी कहा जाता है. भैरव एक प्रकार की पदवी है.

भैरव को भगवान् शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि का अधिपति माना गया है. इनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है. भैरव को मानने वाले दो संप्रदाय में विभक्त हैं. पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव. भैरव काशी और उज्जैन के द्वारपाल हैं. उज्जैन में काल भैरव की जाग्रत प्रतीमा है जो मदीरापान करती है.

इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोड़ाखाल में बटुक भैरव का मंदिर है जिन्हें गोलू देवता के नाम से जाना जाता हैं.
मुख्य रूप से आठ भैरव माने गए हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रुद्र भैरव, 3. चंद्र भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव और 8. संहार भैरव.

हिन्दू धर्म में भैरव को विशाल आकार के काले शारीरक वर्ण वाले, हाथ में भयानक दंड धारण किए हुए और साथ में काले कुत्ते की सवारी करते हुए वर्णन किया गया है. दक्षिण भारत में ये ‘शास्ता’ के नाम से तथा माहाराष्ट्र राज्य में ये ‘खंडोबा’ के नाम से जाने जाते हैं. तामसिक स्वाभाव वाले, ये सभी भैरव तथा भैरवी, मृत्यु या विनाश के कारक हैं, काल के प्रतिक स्वरुप, रोग-व्याधि इत्यादि के रूप में ये ही प्रकट हो, विनाश या मृत्यु की ओर ले जाते हैं.

भैरव नाथ की उत्पत्ति :- भैरव नाथ की उत्पत्ति भगवान शिव के रुधिर से हुई थी. बाद में यह रुधिर दो भागो में बट गया था पहला बटुक भैरव के नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा दुसरा काल भैरव के नाम से . भगवान भैरव नाथ को असितांग, रूद्र, चण्ड, क्रोध, उन्मुक्त, कपाली आदि के नामो से भी पुकारा जाता है. महादेव शिव के पांचवे अवतार के रूप में भैरव नाथ की पूजा की जाती है. नाथ सम्प्रदाय में भगवान शिव की पूजा का अत्यन्त महत्व है.

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भैरव नाथ से जुडी मान्यताएं :- काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में हुआ था. शिव पुराण के अनुसार, अंधकासुर नामक दैत्य के संहार के कारण भगवान् शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई थी. अन्य एक कथा के अनुसार एक बार जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने शिव तथा उन के गाणों की रूपसज्जा को देख कर अपमान जनक वचन कहे.

परन्तु भगवान् शिव ने उस वाचन पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु शिव के शारीर से एक प्रचंड काया का प्राकट्य हुआ तथा वो ब्रह्मा जी को मरने हेतु उद्धत हो आगे बड़ा, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत हो गए. अंततः शिव जी द्वारा मध्यस्थता करने के कारण वो क्रोधित तथा विकराल रूप वाला गण शांत हुआ. तदनंतर, भगवान् शिव ने उस गण को अपने आराधना स्थल काशी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया.

बटुक भैरव :- बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन: ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे. अर्थात ब्र्ह्मा, विष्णु तथा महादिदेव शिव के द्वारा बटुक नाम से वन्दित भैरव की आराधना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है.

बटुक भैरव को भगवान शिव का बाल रूप मना जाता है तथा यह आनंद भैरव के नाम से भी जाने जाते है. उक्त सौम्य स्वरूप की आरधना अत्यन्त फलदायी मानी जाती है तथा सभी कार्य सिद्ध एवं सफल होते है. बटुक भैरव की आरधना से संबंधित मन्त्र – ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ.

भैरव आराधना :- हनुमान जी के अलावा केवल एक मात्र देव भैरव ही है जिनके आरधना से शनि देव के प्रकोप से मुक्ति प्राप्त होती है. आराधना का दिन रविवार एवं मंगलवार नियुक्त है. पुराणों के अनुसार भाद्र पद का दिन भैरव की आराधना के लिए अति उत्तम माना गया है. इस दिन के रविवार को बड़ा दिन मानकर रविवार का व्रत रखा जाता है. आराधना से पूर्व जान ले की कभी कुत्ते को दुत्कारे नहीं ब्लकि यदि आप को कोई कुत्ता दिखे तो उसे बाहर पेट भोजन करना चाहिए.

भैरव तंत्र : योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है.

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