जाने आखिर कैसे हुआ था रीछ मानव जामवन्त का जन्म, तथा उनसे जुड़े अनोखे राज !

जामवन्त को रीछपति कहा जाता है. रीछ का अर्थ होता है भालू, जामवन्त जी समस्त रीछों के राजा थे. लेकिन क्या वे सचमुच भालू मानव थे, रामायण की कथा में उनका इसी रूप में चित्रण किया गया है. ऋक्ष शब्द संस्कृत के अंतरिक्ष शब्द से लिया गया है.

तथा दुनिया भर में इस तारामंडल को अलग अलग नाम से पुकारा जाता है. सप्तऋषि के तारा मंडल को यूनान में बड़ा भालू कहा जाता है. इस तारमंडल के संबंध में अनेक प्राचीन दंत कथाएं प्रचलित है.

पुरानो में जामवन्त जी के विषय में कहा जाता है की उनकी मानसिक शक्ति तथा स्मरण शक्ति बहुत अधिक थी. उन्हें वेद एवं उपनिषद कंठस्थ याद थे,

वे सदैव कुछ न कुछ शिक्षा ग्रहण करते थे तथा उनके स्वध्याय के कारण ही उन्हें लम्बी आयु प्राप्त हुई थी. उन्होंने ही पवन पुत्र हनुमान जी को उनकी विद्या समय आने पर समरण करवाई थी.

जामवन्त के बारे में यह भी कहा जाता है की हनुमान जी तथा परशुराम के बाद जामवन्त ही एक ऐसे व्यक्ति है जिनका तीनो युग में होने का वर्णन ग्रंथो एवं पुराणों में प्राप्त होता है. ऐसी मान्यता है की परशुराम जी आज भी धरती में सशरीर विध्यमान है.

जामवन्त जी की आयु हनुमान जी और परशुराम से भी अधिक मानी जाती है क्योकि उनका जन्म राजा बलि के युग में हुआ था. यानि परशुराम से भी बड़े है जामवन्त जी तथा उनसे बड़े राजा बलि.

आइये जाने है की आखिर जामवन्त जी रीछ थे या मानव आखिर कौन थे उनके माता पिता और कैसा उनका जन्म हुआ था ?

हमारे धर्म ग्रंथो में अधिकत्तर देवताओ के पुत्रों के जन्म का वर्णन मिलता है जैसे सूर्य पुत्र, इंद्र पुत्र, पवन पुत्र, वरुण पुत्र आदि. हनुमान जी तथा भीम को पवन पुत्र कहा गया है इसी तरह पुराणों में जामवन्त जी को अग्नि पुत्र कहा गया है. जामवन्त की माता गन्धर्व थी.

वही एक दूसरी मान्यतानुसार के अनुसार जब ब्रह्म देव सृष्टि का निर्माण कर रहे थे तब उन्होंने एक ऐसा रीछ का निर्माण किया जो दो टांगो से चल सकता था. तथा वह मनुष्य के साथ संवाद भी कर सकता है.

पुराणों के अनुसार वानर एवं मनुष्य में रीछ जनजाती को अधिक विकसित माना जाता था.

कहा जाता है जब देवासुर संग्राम चल रहा था तब देवताओ की रक्षा के लिए अग्नि देव के पुत्र जामवन्त जी का जन्म हुआ तथा उनकी माता एक गन्धर्व थी.

जामवन्त जी ने अपनी आँखों से भगवान विष्णु के वामन अवतार को अवतरित होते देखा.

जामवन्त जी के युग में ही भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राज बलि से दिन पग दक्षिणा में मांगे थे. जिनमे पहले पग में ही भगवान ने पूरा आकाश नाप लिया था

तथा दूसरे पग में उन्होंने पूरी धरती नाप ली तथा तीसरे पग के समय राजा बलि ने अपना सर उनके पैरो के नीचे रख दिया. वामन अवतार में जामवन्त जी अपनी युवावस्था में थे.

जब त्रेतायुग आया तो वे थोड़े से बूढ़े हो चले थे. त्रेतायुग में जामवन्त जी ने भगवान श्री राम की सेना के साथ मिलकर उनकी रावण के विरुद्ध युद्ध में मदद करी थी. जामवन्त जी भगवान श्री राम के वानर सेना के प्रमुख सेनापति थे.

जामवन्त जी में इतना सामर्थ्य था की वह लंका में जाने से पहले मार्ग में पड़ने वाले विशाल समुद्र को आसानी से लांघ सकते थे. परन्तु अपनी वृद्ध अवस्था होने के कारण उन्होंने हनुमान जी से समुद्र को लांघने के लिए कहा था.

जामवन्त जी आकर एवं प्रकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे. जामवन्त जी बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति थे तथा वे चिरंजीवी व्यक्तियों में से एक है जो आज भी कलयुग में जीवित माने जाते है.

जामवन्त जी के बारे में एक कथा के अनुसार जब राम रावण से युद्ध करने के पश्चात वापस अयोध्या जा रहे थे तो जामवन्त जी ने श्री राम को युद्ध की चुनौती दी थी तब श्री राम ने उन्हें अपने अगले अवतार में उनकी मनोकामना पूरी करने का वरदान दिया था.

इसी वरदान के फलस्वरूप जब भगवान विष्णु ने जब कृष्ण अवतार लिया था तब जामवन्त जी के साथ उन्होंने 21 दिन तक युद्ध किया था.

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