कामख्या मंदिर से जुड़े ऐसे रहस्य जिन्हे जान आप हो जाएंगे हैरान !

माता दुर्गा के अनेको रूप है तथा माता अपने इन सभी रूपों में अपने भक्तो की मनोकामनाएं पूर्ण करती है. भक्तो की भी माँ दुर्गा के प्रति अटूट आस्था एवं श्रद्धा है इसी आस्था का प्रतीक माना जाता है असम की राजधानी दिसपुर में स्थित माँ कामख्या का मंदिर. माता के सभी शक्तिपीठों में से कामख्या शक्तिपीठ को उत्तम माना गया है.

भगवान विष्णु ने महादेव शिव का सती के प्रति मोह को भंग करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भाग करें थे. तथा जिन-जिन स्थानों पर ये भाग गिरे थे वे शक्तिपीठ कहलाए.

कहा जाता है की यहाँ पर माता सती का गुह्वा अर्थात योनि भाग गिरा था.जिस कारण यहाँ कामख्या महाशक्ति पीठ की उत्तपति हुई. 51 शक्तिपीठों में एक पीठ होने के साथ ही यह तंत्र साधना के लिए भी प्रसिद्ध है. देवी साती के इस मंदिर में देवी की योनि की पूजा की जाती है.

यह मंदिर अनेक चमत्कारों से भरा हुआ है तथा इससे अनेको रहस्य जुड़े हुए है. आज हम आपको कामख्या मंदिर के कुछ ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे है.

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मंदिर में नहीं है स्थापित देवी की कोई भी मूर्ति : –

माता के इस मंदिर में कोई भी मूर्ति स्थापित नहीं है तथा मूर्ति के स्थान पर माता की योनि की पूजा करी जाती है. मंदिर में एक कुंड सा है जो सदैव फूलों से ढका रहता है. मंदिर के पास ही स्थित एक अन्य मंदिर में माता की मूर्ति है. माता का यह शक्तिपीठ महाशक्तिपीठ कहलाता है.

यहाँ प्रसाद के रूप में बाटा जाता है गिला कपड़ा :-

माता के मंदिर में एक अनोखी चीज़ होती है यहाँ प्रसाद के रूप में भक्तो को गिला कपड़ा दिया जाता है ,जिसे अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं . माता के रजस्वला होने के समय मंदिर के पुजारियों द्वारा प्रतिमा के चारो और सफेद रंग के कपड़े बिछा दिए जाते है. तीन दिन के बाद जब मंदिर का दरवाजा खोला जाता है तो वह माता के रज से लाल व भीगा हुआ होता है. इसी को पुजारियों द्वारा माता के भक्त में प्रसाद के रूप में दिया जाता है.

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मंदिर का झरना है चमत्कारी :-

मंदिर में बहता झरना शक्‍ति का प्रतीक माना जाता है. दरअसल मंदिर में मूर्ति न होकर एक समतल चट्टान के बीच देवी की योनि स्‍थापित है. इसके ऊपर झरना बह रहा है. मान्‍यता है कि इस जल के नियमित सेवन से हर बीमारी से मुक्‍ति मिल सकती है.

यहाँ साधू एवं तांत्रिक पाते है अलौकिक शक्ति :-

मान्यता है की कामख्या मंदिर के साधू तंत्र साधना से चमत्कार करने सक्षम है. यहाँ के तांत्रिको के पास बुरी शक्तियों को दूर करने का सामर्थ्य होता है परन्तु वे अपने शक्तियों को सोच-विचार कर ही प्रयोग में लाते है. मंदिर के साथ ही कामदेव का भी मंदिर है. किवदंती है कि भगवान शिव ने कामदेव का इसी स्‍थान पर भस्‍म किया था. यहां आने वाले हर भक्‍त की मनोकामना अवश्‍य ही पूर्ण होती है.

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मान्यता है की लुप्त हो चुका ही मूल मंदिर:-

कथा के अनुसार, एक समय पर नरक नाम का एक असुर था. नरक ने कामाख्या देवी के सामने विवाह करने का प्रस्ताव रखा. देवी उससे विवाह नहीं करना चाहती थी, इसलिए उन्होंने नरक के सामने एक शर्त रखी.

शर्त यह थी कि अगर नरक एक रात में ही इस जगह पर मार्ग, घाट, मंदिर आदि सब बनवा दे, तो देवी उससे विवाह कर लेंगी. नरक ने शर्त पूरी करने के लिए भगवान विश्वकर्मा को बुलाया और काम शुरू कर दिया. काम पूरा होता देख देवी ने रात खत्म होने से पहले ही मुर्गे के द्वारा सुबह होने की सूचना दिलवा दी और विवाह नहीं हो पाया. आज भी पर्वत के नीचे से ऊपर जाने वाले मार्ग को नरकासुर मार्ग के नाम से जाना जाता है और जिस मंदिर में माता की मूर्ति स्थापित है, उसे कामादेव मंदिर कहा जाता है.

मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि नरकासुर के अत्याचारों से कामाख्या के दर्शन में कई परेशानियां उत्पन्न होने लगी थीं, जिस बात से क्रोधित होकर महर्षि वशिष्ट ने इस जगह को श्राप दे दिया. कहा जाता है कि श्राप के कारण समय के साथ कामाख्या पीठ लुप्त हो गया .

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नव वधु के रूप में की जाती है पूजा :-

कामख्या देवी की पूजा भगवान शिव की नव वधु के रूप में की जाती है. काली और त्रिपुर सुंदरी देवी के बाद माता कामख्या तंत्रिक साधुओं की साधना के लिए महत्वपूर्ण देवी है.

भैरव दर्शन के बिना अधूरी है कामख्या मंदिर की यात्रा :-

कामख्या मंदिर के पास ही कुछ दुरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है, उमानंद भैरव ही इस शक्तिपीठ के भैरव है. यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में है. कहा जाता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. कामख्या माता के दर्शन के बाद भैरव जी के दर्शन करने से भक्तो की सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती है.

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