आखिर रावण की मृत्यु के पश्चात भी क्यों करना पड़ा श्री राम को लंका पर पुनः आक्रमण ?

लंका विजयी के पश्चात भगवान श्री राम, देवी सीता एवं अपने भ्राता लक्ष्मण के साथ अयोध्या आ चुके थे. लेकिन एक दिन जब श्री राम राजदरबार में बैठ कर लोगो की समस्या सुन रहे थे तभी लंका के राजा विभीषण, अपनी पत्नी सरमा, पुत्र वैभिषनी तथा चार मंत्रियों के साथ वयकुलतापूर्ण श्री राम के पास आये एवं उनके चरणों में गिर पड़े.

उन्हें इस तरह से घबराया देख श्री राम आश्चर्यचकित हो गए तथा विभीषण को अपने चरणों से उठाते हुए उन्हें गले से लगाया. इसके बाद उनसे उनके इस तरह अचानक आगमन एवं भयभीत होने का कारण पूछा.

भगवान श्री राम को हाथ जोड़े विभीषण बोले, हे प्रभु श्री राम ! मेरे भ्राता कुम्भकर्ण का पुत्र मूलकासुर मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उसे अशुभ माना गया तथा उसे वन में छुड़वा दिया गया. परन्तु वन में वह मधुमखियों का शहद पीकर जिन्दा रहा तथा जब वह बड़ा हुआ तो उसने तपस्या करनी आरम्भ कर दी.

उसने अपने तपस्या से ब्र्ह्मा जी को प्रसन्न कर असीम बल का वरदान प्राप्त कर लिया तथा अपने पातालवासी मित्रो के साथ मिलकर लंका पर आक्रमण कर दिया.

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मेने छः महीने तक किसी प्रकार से उस से युद्ध किया व कल रात्रि के समय में अपनी पत्नी, पुत्रों एवं मंत्रियो के साथ एक सुरंग के रास्ते यहाँ पहुंचा हु.

प्रभु मूलकासुर ने यह प्रतिज्ञा कर रखी है की पहले वह मेरा वध करेगा तथा इसके बाद वह अपने पिता के कुम्भकर्ण को मारने वाले श्री राम यानि की आप से अपना प्रतिशोध लेगा. अतः प्रभु वह आपसे युद्ध करने आता ही होगा इसलिए आपको जो उचित लगे कृपया शीघ्र कीजिये.

अपने भक्त विभीषण की बात सुनकर भगवान श्री राम ने अपने भाइयो, पुत्रों, हनुमान जी एवं सेनिको के साथ लंका के लिए कूच किया. वे पुष्पक विमान की सहायता से लंका पहुंचे.

जब यह बात मूलकासुर को ज्ञात हुई की भगवान श्री राम अपनी सेना के साथ उससे युद्ध करने के लिए पहुंच चुके तो उसने भी अपने सेना तैयार करी तथा युद्ध के लिए रणभूमि में पहुंच गया.

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दोनों तरफ से 7 दिनों तक भयंकर युद्ध चलता रहा. भगवान श्री राम की सेना में जो भी घायल होता हनुमान जी संजीवनी बूटी की सहायता से उसे पुनः स्वस्थ कर देते.

परन्तु जब श्री राम को लगने लगा की मूलकासुर को युद्ध में परास्त करना असम्भव सा प्रतीत हो रहा तब वे एक वृक्ष के समीप गए. तथा उस वृक्ष के निचे वे ध्यान मुद्रा में बैठ ब्र्ह्मा जी का आह्वान करने लगे.

भगवान राम के आह्वान पर ब्र्ह्मा जी तुरंत प्रकट हुए तथा उन्हें मूलकासुर के वध का उपाय बताते हुए बोले मेने मूलकासुर को किसी स्त्री के हाथो वध का वरदान दिया अतः इस राक्षस का वध केवल माता सीता के हाथो ही हो सकता है.

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ब्र्ह्मा जी द्वारा बताए गए उपाय के अनुसार श्री राम ने माता सीता को अयोध्या से लाने के लिए हनुमान जी एवं विन्तानन्दन गरुड़ को वहां भेजा तथा माता सीता जब लंका पहुंची तो उन्होंने मूलकासुर का वध चंडिकास्त्र चलाकर किया

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