रामायण की एक अनसुनी कथा, जब राजा बलि ने तोड़ा महापंडित रावण का घमंड !

यह कथा राम और रावण के युद्ध के समय की है, इस युद्ध में रावण के अनेक महारथी योद्धा मारे जाने के कारण वह अपने आपको युद्ध में अकेला पा रहा था. उधर श्री राम जी की वानर सेना का भी अत्यधिक नुक्सान हो चुका था. परन्तु फिर भी इस युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकल रहा था.

रावण के सभी दिग्गज योद्धा मारे जा चुके थे, उसे श्री राम के हाथो युद्ध में अपनी पराजय समीप आते दिख रही थी परन्तु तभी उसके मन में अहंकार की भावना उतपन्न हुई,

वह अपने से मन से कहने लगा की में तो लोकेश्वर हु फिर मेरी हार कैसे संभव हो सकती है. मेने देवताओ तक को युद्ध में पराजित किया है तथा वे मेरे आदेशों का दास की तरह पालन करते है.

कोई भी देवता या प्राणी इतना साहस नहीं रखता की वह लंककेश को किसी भी तरह का नुक्सान पहुंचा सके. रावण ने घमंड में अपनी छाती चौड़ी कर ली परन्तु अगले ही पल उसे यह चिंता सताने लगी की अगर ऐसी स्थिति उतपन्न होती है की उसकी पराजय समीप हो तब वह क्या करेगा.

इस स्थिति में उसे ऐसे राजा की आवश्यकता पड़ेगी जो अत्यधिक शक्तिशाली हो तथा जो हर क्षेत्र में निपुर्ण हो व उसकी सहायता करने का सामर्थ्य रखता हो.

परन्तु इस प्रकार का राजा उसे मिलेगा कहा, रावण ने खुद से यह सवाल किया. इस संसार में को भी अत्यधिक बलशाली नहीं है ना तो देव ना ही दानव इसलिए अब रावण एक ऐसे राजा की तलाश थी जो तेजस्वी हो. त

भी उसे राजा बलि की याद आई. राजा बलि सुताल लोक रहते थे जहाँ साधारण व्यक्ति का जाना नामुमकिन था.

अतः रावण ने स्वयं जाकर राजा बलि से सहायता मांगने की सोची. रावण राजा बलि के महल में पहुंचा तो उसे प्रवेश द्वारा पर भगवान विष्णु के अवतार वामनदेव ने रोका,

वे स्वयं राजा बलि के रक्षक बने हुए थे. रावण ने वामनदेव की नजरो से बचकर महल की भीतर घुसने के लिए सूक्ष्म रूप धारण कर लिया.

परन्तु भगवान की नजरो से कुछ नहीं छुप सकता उन्होंने रावण को सूक्ष्म रूप में महल के भीतर घुसते हुए देख लिया.



वामन देव ने भी रावण को ऐसा महसूस करवाया की उन्होंने कुछ नहीं देखा. फिर जैसे ही रावण प्रवेश द्वार को पार करने वाला था वामनदेव ने अपने पैरो से उसे दबा दिया.

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