महादेव शिव का एक मजाक, और सिंह बना गया देवी माँ का वाहन, देवी पुराण कथा !

दुर्गा माता का वाहन सिंह है तथा वह सिंह पर सवार होकर अपने भक्तो के कष्टो को हरने आती है व दुष्ट एवम पापियो का सर्वनाश करती है. परन्तु क्या आपको पता है की देवी माँ को उनकी सवारी सिंह कैसे प्राप्त हुआ इसके सम्बन्ध में पुराणों में एक बहुत ही रोचक कथा है.

हिमालयराज की पुत्री देवी पार्वती ने बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में चुन लिया था, उनकी ही भक्ति एवम आरधना में लीन रहती थी. जब देवी विवाह के योग्य हुई तो भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए देवी पार्वती एक उच्च स्थान पर तपस्या के लिए गयी.

देवी पार्वती की कड़ी तपस्या को देख भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए, तथा उन्होंने माता पार्वती को स्वयं उनके पति के रूप में प्राप्त होने का वरदान दिया. माता पार्वती एवम भगवान शिव का विवाह बहुत ही धूमधाम से सम्पन्न हुआ जिसमे सभी देवता, ऋषि, शिव गण इत्यादि सम्ल्लित हुए.

एक बार भगवान शिव एवम माता पार्वती दोनों कैलाश पर्वत में बैठे एक दूसरे से मजाक कर रहे थे. क्योकि माता पार्वती ने भगवान शिव को अपनी कड़ी तपस्या से प्राप्त किया था अतः उस कड़ी तपस्या के परिणामस्वरूप उनके शरीर का रंग हल्का काला पड़ गया था.

महादेव शिव ने मजाक मजाक में देवी पार्वती को उनके शरीर के रंग के कारण काली कह दिया. देवी पार्वती को भगवान शिव का यह मजाक अच्छा नही लगा और वे शिव से रुष्ट हो गयी. देवी पार्वती कैलाश पर्वत छोड़कर वापस तपस्या में लीन हो गई.

इसी बीच एक भूखा शेर अपने शिकार की तलाश में उस स्थान पर आया जहाँ माता पर्वती तपस्या में लीन थी. उस शेर की मंशा देवी को अपना आहार बनाने की थी परन्तु वह माता को तपस्या में लीन देखकर वही बैठ गया और उनके तपस्या से उठने की प्रतीक्षा करने लगा. माता के उठने की प्रतीक्षा में उसे वहां अनेक साल बीत गए परन्तु वह शेर अपने स्थान से हिला नही.

इसी बीच देवी पार्वती की कड़ी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव शिव उनके समक्ष प्रकट हुए तथा उन्हें गौर वर्ण अर्थात गौरे होने का वरदान दिया.

महादेव शिव के दिशानिर्देसानुर देवी पार्वती गंगा नदी के तट पर गयी, वहां स्नान के पश्चात माता के शरीर से एक सावली आकृति देवी कोशिकी प्रकट हुई.गौरवर्ण हो जाने के कारण देवी पार्वती गौरी के नाम से भी जाने जाने लगी.

देवी पार्वती ने उस सिंह को अपना वाहन बना लिया जो उन्हें अपना आहार बनाने के लिए वहां वर्षो से बैठा हुआ था. इसका कारण यह था की वह सिंह माता को अपना आहार बनाने के चक्कर में वर्षो से उन्हें एकटक देखते हुए उन पर ध्यान लगाए हुआ था.

देवी ने इसे सिंह द्वारा अपनी तपस्या मान लिया तथा उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी माता ने उस सिंह को अपनी सेवा में रख लिया. तब से ही शेर माता की सवारी बन गया.

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