जब महान मह्रिषी नारद मुनि को भी मात दी इस साधारण तपस्वी ने, ”विश्वाश में छुपी शक्ति”!

एक समय नारद मुनि प्रभु का स्मरण करते हुए आकाश मार्ग से गुजर रहे थे, तभी उनके मन में अहंकार की भावना जगी. वे सोचने लगे की इस पूरी सृष्टि में वे ही एकमात्र विष्णु के परम भक्त है. अहंकार में मदमस्त वे एक पर्वत के पास से गुजरे.

अचानक नारद मुनि के नजर उस पर्वत के समीप ही एक वटवृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए तपस्वी पर पड़ी. नारद मुनि कुछ सोचते हुए उस तपस्वी के समीप पहुंचे और उसे देखने लगे.

नारद मुनि के तेज से वह तपस्वी अपनी तपस्या से जाग गया, तथा नारद मुनि के चरणों को छू कर उसने उन्हें प्रणाम किया.

इसके बाद वह तपस्वी नारद मुनि से बोला हे, देवऋषि नारद मुनि आप पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा है. मुझे उनके तपस्या करते करते यहाँ कई वर्ष हो गए है अतः कृपया मुझे बतलाये की मुझे उनके दर्शन कब होंगे.

उस तपस्वी की बात सुनकर पहले तो नारद जी ने कुछ भी बताने से इंकार किया परन्तु उसके बार बार जिद करने पर वह बोले इस वटवृक्ष में तुम्हे जितनी भी टहनियाँ दिखाई दे रही है उतने ही वर्ष तुम्हे भगवान विष्णु के दर्शन प्राप्त करने में अभी और लगेंगे.

नारद जी की बात सुनकर उस तपस्वी को निराश हुई. उसने सोचा इतने वर्ष उसने घर रह कर गृहस्थी तथा भक्ति की होती है तो वह काफी पूण्य अर्जित कर चुका होता है. में बेकार में ही यहाँ तपस्या करने चले आ गया.

नारद जी उन्हें परेशान हैरान देखकर वहां से चले गए.

आगे चलते समय नारद जी संयोग से एक ऐसे वन में पहुंचे, जहां एक तपस्वी तप में लीन था. वह एक बहुत ही प्राचीन पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा था जिसमे अनन्त पत्तियां एवं डाले थी.

वह भी नारद मुनि के तेज से जाग गया तथा नारद मुनि से प्रभु दर्शन में लगने वाले समय के बारे में पूछने लगा. नारद जी ने उसे टालना चाहा परन्तु वह बार बार अनुरोध करने लगा. तब नारद जी उस तपस्वी से बोले की इस पीपल के वृक्ष में जितने पत्ते है अभी तुम्हे प्रभु दर्शन में उतना ही समय लगेगा.

हाथ जोड़कर खड़े उस तपस्वी ने जैसे ही यह सुना, वह खुशी से झूम उठा और बार-बार यह कहकर नृत्य करने लगा कि प्रभु उसे दर्शन देंगे. उसके रोम-रोम से हर्ष की तरंगें उठ रही थीं.
नारद जी उस तपस्वी को देख सोचने लगे की पहले वह जिस तपस्वी से मिले थे तथा इस तपस्वी दोनों में कितना बड़ा अंतर है.

एक तो अपने तपस्या पर ही संदेह था वह मोह से अभी तक उबर नहीं सका और दूसरे को ईश्वर पर इतना विश्वास है कि वह वर्षों प्रतीक्षा के लिए तैयार है.

तथा कुछ देर बार नारद मुनि को भी ध्यान की वह अपने ईश्वर भक्ति पर घमंड कर रहे थे परन्तु इस तपस्वी की आस्था को देख नारद मुनि ने अपने आपको उस तपस्वी से पराजित होता पाया.

तभी वहां अचानक अलौकिक प्रकाश फैल गया और प्रभु प्रकट होकर उस तपस्वी से बोले, ‘वत्स! नारद ने जो कुछ बताया वह सही था पर तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास में इतनी गहराई है कि मुझे अभी और यहीं प्रकट होना पड़ा.

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