प्रभु राम ने फोड़ी थी इंद्र के पुत्र की आँख, कलयुग में भी पक्षी के रूप में वे रहते है काने !

बात उस समय की जब भगवान श्री राम, देवी सीता तथा लक्ष्मण के साथ वनवास व्यतीत करते हुए पंचवटी वन में रह रहे थे. उस समय पंचवटी वन वसंत ऋतू होने के कारण अपने पुरे श्रृंगार में थी, हर जगह हरियाली थी तथा पूरा वातावरण सुगन्धित पुष्पों से महक रहा था.

देवी सीता वन के इस रमणीय वातावरण पर मन्त्र मुग्ध थी. भगवान श्री राम ने देवी सीता को वसंत ऋतू की भेट देने के लिए वन के सबसे सुंदर पुष्पों को माला बनाने के लिए चुना तथा एक सुन्दर माला बनाकर देवी सीता को पहना दिया.

देवलोक में भी देवताओ के मध्य भगवान श्री राम के वनवास के संबंध में अधिकत्तर चर्चाएं होती रहती थी. देवराज इंद्र के पुत्र जयंत इन चर्चाओं को बहुत ही रूचि लेकर सूना करते थे.

जयंत को इस बात पर विश्वास नहीं होता था की स्वयं भगवान विष्णु के अवतार प्रभु राम एक समान्य मनुष्य के रूप में वनवास के कष्टों को झेल रहे है, क्या वे सच में भगवान विष्णु ही है या कोई साधारण मनुष्य ? ऐसा सोच जयंत ने भगवान श्री राम की परीक्षा लेनी की सोची.

जयंत को अपने ऊपर अभिमान था की उसके पास बहुत तेज गति है.तथा इस अभिमान का कारण यह था की जब समुन्द्र से अमृत निकाला जा रहा था तब असुरो से इसकी सुरक्षा के लिए अमृत को जयंत को दे दिया गया.

जब उस अमृत को प्राप्त करने के लिए असुर जयंत के पीछे भागे तो जयंत पवन के वेग से उनकी पहुंच से दूर जा निकला. तब से जयंत को यह अभिमान हो गया की उसे गति में स्वयं पवन देव भी नहीं हरा सकते.

उस का अभिमान इंतना अधिक बढ़ चुका था की उसने भगवान श्री राम की परीक्षा लेने का दुस्साहस किया.

इंद्र पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण किया तथा पंचवटी वन में पहुंचकर उस वृक्ष के ऊपर बैठ गया जिसकी छाया में देवी सीता एवं श्री राम जी बैठे हुए थे.

माता सीता भगवान श्री राम द्वारा भेट स्वरूप दिए गए पुष्पों के हार को पाकर बहुत पसन्न थी, तथा प्रभु राम को भी इस बात की संतुष्टि थी की महलो के सुखो को छोड़ कष्टों में समय व्यतीत कर रही देवी सीता आज भले ही कुछ देर के लिए परन्तु प्रसन्न है.

परन्तु दुष्ट जयंत से माता सीता एवं प्रभु श्री राम की प्रसन्ता देखी नहीं गई, वह वृक्ष से निचे उतरा तथा बहुत तेजी से माता सीता के पैरो में प्रहार करता हुआ वापस वृक्ष के ऊपर जा बैठा. प्रहार इतने तेजी से किया गया था की माता सीता के पैरो से रक्त बहने लगा.

माता सीता के पैरो से बह रहे रक्त को देख भगवान श्री राम क्रोधित हो उठे तथा उन्हें यह ज्ञात हो चुका था की यह किसने और किस मंशा से किया है. उन्होंने पास में ही पड़े एक सरकंडे को उठाया तथा उसे अपने धनुष पर रख निशाना साधते हुए उस सरकंडे को आदेश दिया की दुष्ट को दण्ड दे.

प्रभु श्री राम की आज्ञा पाते है वह सरकंडा ब्रह्मबाण में परिवर्तित हो गया तथा जयंत की ओर बढ़ने लगा. ब्रह्म बाण को अपनी ओर आते देख जयंत देवलोक की ओर भागा.

भागते भागते जयंत अपने पिता देवराज इंद्र के पास पहुंचा तथा ब्रह्म बाण से रक्षा करने की प्राथना करने लगा. जब इंद्र ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जाना तो वे स्वयं अनिष्ट होने के डर से काँपने लगे.

इंद्र देव अपने पुत्र जयंत से बोले की तुम्हारी रक्षा अब मेरे बस की बात नहीं, तुम्हे ब्रह्म देव की शरण में जाना होगा. जयंत अपने प्राणो की रक्षा के लिए जब ब्रह्म देव के शरण में पहुंचा तो उन्होंने भी इसमें असमर्थता जताई.

जयंत अपनी प्राणो की रक्षा के लिए इधर उधर भटकने लगा तथा ब्रह्म बाण भी उनके पीछा लगा हुआ था.

भागते भागते अंत में जयंत नारद मुनि के पास पहुंचा तथा उनसे बोला आप तो नारायण भक्त है कृपया मुझे उनके इस कोप से बचने का कोई उपाय सुझाओं.

नारद जी को उसकी दशा पर दया आ गई, तथा उसे उसकी दुष्टता का पर्याप्त दण्ड भी प्राप्त हो चुका था.

नारद जी ने जयंत को उपाय सुझाते हुए बतलाया की तुम माता सीता के चरणों में जाओ तथा उनसे क्षमा याचना की प्राथना करो यही एकमात्र उपाय तुम्हारे पास है.

उपाय पाते ही जयंत बहुत तेजी से माता सीता के पास अपने वास्तविक स्वरूप में पहुंचा तथा उनके चरणों में गिरकर क्षमा याचना मांगने लगा. माता सीता ने जयंत को क्षमा कर दिया तथा प्रभु श्री राम से ब्रह्म बाण वापस लेने को कहा.

प्रभु श्री राम ने जयंत से कहा की मेने ब्रह्म बाण को तुम्हे दण्ड देने का आदेश दिया अतः यह बगैर दण्ड दिए वापस नहीं आ सकता, इसलिए तुम्हे अंगभंग का दण्ड मिलता है. इस प्रकार से बर्ह्म बाण ने जयंत की एक आँख फोड़ डाली. तथा ऐसी मान्यता है की तभी से कौए काने होते है.

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