जब मृत्यु के देव यमराज और अर्जुन के मध्य हुआ भीषण युद्ध, जाने क्या हुआ उसका परिणाम ?

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एक बार अर्जुन को अपने धनुर्विद्या पर बहुत घमंड हो चुका था वह सोचने लगे की इस दुनिया में कोई भी उनके समान धनुधर नहीं है. अर्जुन के इस अभिमान को भगवान श्री कृष्ण समझ गए परन्तु वे अर्जुन से कुछ बोले नहीं.

भगवान श्री कृष्ण सिर्फ उचित समय का इन्तजार करने लगे. एक दिन भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को अपने साथ भ्रमण के लिए ले गए, मार्ग में उन्होंने एक कुटिया देखि जहाँ से रोने की आवाजे आ रही थी.

भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन ने उस कुटिया के भीतर प्रवेश किया तो पाया की एक ब्राह्मण एवम ब्राह्मणी अपने मृत बच्चे को हाथ में लिए रो रहे थे. वासुदेव श्री कृष्ण को देख ब्राह्मणी उनके समीप आयी तथा रोते हुए अपनी व्यथा सुनाते हुए बोली हे प्रभु मेरी जब भी कोई सन्तान जन्म लेती है तो वह जन्म के समय पश्चात ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती है.

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हे प्रभु ! क्या हम सारे जीवन सन्तान हीन ही रहेंगे.. भगवान श्री कृष्ण उस ब्राह्मणी को समझाते हुए बोले की ये सब तो नियति का खेल है उसके आगे हम कुछ नहीं कर सकते.

भगवान श्री कृष्ण के समीप ही अर्जुन खड़े थे, अपने धनुर्विद्या के अभिमान में डूबे अर्जुन उस ब्राह्मीन से बोले तुम्हे अब और दुःख सहने की कोई जरूरत नहीं है, में स्वयं तुम्हारे पुत्रो के रक्षा करूँगा.

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इसके बाद अर्जुन उस ब्राह्मीन के पति से बोले की इस बार तुम अपनी पत्नी के प्रसव के समय मुझे बुला लेना देखता कैसे यमराज तुम्हारे बच्चे के प्राण हरते है. अभिमान में डूबे अर्जुन ऐसा कहकर भगवान श्री कृष्ण के साथ वापस हस्तिनापुर की ओर लोट चले.

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