427 साल के बाद पहली बार बन रहा है श्राद्धो में ऐसा संयोग, जाने किस दिन फलदायी रहेगा आपके पितरो का श्राद्ध !

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हमारे सनातन हिन्दू धर्म में श्राद्ध के अवसर पर अपने पूर्वजो को पिंडदान एवम तर्पण के माध्यम से तृप्त किया जाता है. ये श्राद्ध अथवा पितृ पक्ष अश्विन मास कृष्ण पक्ष की पूर्णमासी में भाद्रपद का क्षय होने के साथ आरम्भ होते है . इस बार पितृ पक्ष 16 सितम्बर, शुक्रवार से शुरू हो रहे है तथा 30 सितम्बर तक ये पितृपक्ष चलेंगे.

इस बार के पितृ पक्ष के 427 साल के बाद पहली बार ऐसा संयोग बन रहा है जिसमे शारदीय नवरात्र पुरे 10 दिन के पड रहे है तथा श्राद्ध का 1 दिन घटकर 16 दिन की जगह 15 दिन का हो गया है.

ज्योतिषाचार्य के अनुसार इस बार 16 सितम्बर से श्राद्ध आरम्भ होंगे जिनमे पहला पूर्णिमा श्राद्ध पड़ रहा है. इसकी पश्चात सप्तमी तिथि क्षय होगी लेकिन श्राद तृतीया एवम चतुर्थी 19 सितम्बर से आरम्भ होंगे.

तृतीया श्राद्ध दोपहर 3 बजकर 7 मिनट तक रहेगा. इसके बाद चतुर्थी शुरु हो जाएगी. जो कि अगले दिन 11 बजकर 58 मिनट कर रहेगी. 1 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरु है.

जाने किस दिन पेडगा कोन सा श्राद्ध :-

शास्त्रों के अनुसार हमेशा दोपहर के बाद ही श्राद्ध निकाले जाते हैष इस बार श्राद्ध 1 बजकर 33 मिनट से 3 बजकर 58 मिनट तक रहेगा.

16 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध
17 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध
18 सितंबर- द्वितीया श्राद्ध
19 सितंबर- तृतीया श्राद्ध, चतुर्थी श्राद्ध
20 सितंबर- पंचमी श्राद्ध
21 सितंबर- छठ श्राद्ध
22 सितंबर- सप्तमी श्राद्ध
23 सितंबर- अष्टमी श्राद्ध
24 सितंबर- नवमी श्राद्ध

25 सितंबर- दशमी श्राद्ध
26 सितंबर- एकादशी श्राद्ध
27 सितंबर- द्वादशी श्राद्ध
28 सितंबर- त्रयोदशी श्राद्ध
29 सितंबर- चतुर्दशी श्राद्ध
30 सितंबर- सर्व पितृ अमावस्या श्राद्ध

जिन पितरो का स्वर्गवास चतुर्थी के दिन हुआ था उनका श्राद्ध चतुर्दशी को नहीं करना चाहिए. इन पितरो का श्राद्ध त्रयोदशी अथवा अमावश्या के दिन करना उचित माना गया है . अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु का दिन आपको ज्ञात न हो तो उसका भी श्राद्ध अमावश्या के दिन उचित माना गया है.

अगर किसी व्यक्ति का स्वर्गवास पूर्णिमा का हो तो उसका श्राद्ध शुक्ल पूर्णिमा को करना उचित रहेगा. यदि किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हुई है जैसे वाहन दुर्घटना अथवा किसी जानवर के काट लेने से , ऐसे व्यक्ति का श्राद चतुर्दशी तिथि को करना चाहिए.

इसके अतिरतिक्त दादी-दादी, नाना-नानी आदि का श्राद्ध पूर्णिमा को करना चाहिए .

श्राद्धो में नवमी तिथि का विशेष फल बतलाया गया है. इस विशेष तिथि को सौभाग्यशाली स्त्रियों का श्राद्ध किया जाता है . पावणा पद्धति से द्वादशी तक सन्यासी पितरो का श्राद्ध किया जाता है. अश्विन कृष्ण पक्ष को भी श्राद्ध के लिए उचित माना गया है.

श्राद्ध की उपयोगित बहुत महत्व रखित है इस प्रक्रिया के माध्यम से हम अपने पितरो को तृप्त कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते है . यदि किसी से उनके पितृ रूठ जाए तो उन्हें अनेक समस्याओ का सामना करना पड़ता है.

जिन व्यक्तियों के कुंडली में पितृ दोष होता है उनके घर में सदैव क्लेश रहता है. दरिद्रता का वहां वास होता है तथा पुरे घर में अशांति का साया होता है .
आप जिस दिन अपने पितरो का श्राद्ध करवा रहे हो तो ध्यान रखे की श्राद्ध के लिए केवल सूर्योदय से 12 बजे तक का समय ही उत्तम माना जाता है.

प्रयास करे की इसी समय के बिच ब्रहामण द्वारा तर्पण करा लिया जाए. इसके लिए प्रातः जल्दी उठ स्नान आदि से निमित होकर देव स्थान एवम पितृ स्थान को गाय के गोबर से लेप ले तथा गंगा जल के माध्यम से उसे शुद्ध कर ले.

पितरो की निमित अग्नि में गाय का दूध, घी, दही , खीर आदि अर्पण करे. तथा ब्राह्मण को भोजन से पूर्व पंचबलि देवता, गाय, कौआ, कुत्ता और चींटी के लिए अलग से भोजन एक पात्र में निकाल ले.

ध्यान रखे की गो माता को भोजन देते समय आपका मुह पश्चिम की तरफ होना चाहिए. कौए और कुत्ते को भोजन पृथ्वी अर्थात जमीन पर कराना चाहिए. देवता एवम चींटी के लिए भोजन पत्ते पर करना उचित होता है.

पितरो का श्राद्ध बिना पंचबलि के पूर्ण नहीं माना जाता है. इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराये तथा उसे दक्षिणा के साथ खुसी खुसी विदा करे.

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