जाने कामाख्या देवी मंदिर कैसे बना और उससे जुडी रोचक बाते | kamakhya devi mandir

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कामाख्या देवी मंदिर से जुडी कुछ रोचक बाते kamakhya devi mandir 

कामाख्या देवी मंदिर असम गुवाहाटी के जिस स्थान पर स्थित है वह भारत का पूर्वोत्तर इलाका है जो बेहद खूबसूरत एवम अलग संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है. यहां न सिर्फ राज्य, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र की विविधता साफ तौर पर देखी जा सकती है. संस्कृति, व्यवसाय और धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र होने के कारण आप यहां विभिन्न नस्लों, धर्म और क्षेत्र के लोगों को एक साथ रहते देख सकते हैं.

कामाख्या देवी मंदिर का नाम कैसे पड़ा कामख्या

कामाख्या देवी मंदिर  kamakhya devi mandir के नाम के पीछे यह कथा बताई जाती है की एक बार किसी श्राप के कारण कामदेव को अपना पुरुषोत्तव खोना पड़ा बाद में कामाख्या देवी के जननांगों और गर्भ से उन्हें मुक्ति मिली. तब से ही कामाख्या देवी का मन्दिर स्थापित हुआ व वहां देवी की मूर्ति को रखा गया.

कुछ लोगों का ये भी मानना है की ये वही स्थान हैं जहां देवी सती और भगवान शिव के बीच प्रेम की शुरुआत हुई. संस्कृत भाषा में प्रेम को काम कहा जाता है अतः इस मंदिर का नाम कामाख्या देवी रखा गया.

कामाख्या देवी मंदिर का पौराणिक इतिहास history of kamakhya devi mandir

108 शक्ति पीठों में शुमार होने के अलावा, कामाख्या देवी मंदिर और इससे जुडी किवदंती अपने में एक बहुत ही रोचक दास्तां समेटे हुए है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार देवी सती अपने पिता द्वारा किये जा रहे महान यज्ञ में शामिल होने जा रही थी तब उनके पति भगवान शिव ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया। इसी बात को लेकर दोनों में झगड़ा हो गया और देवी सती बिना अपने पति शिव की आज्ञा लिए हुए उस यज्ञ में चली गयी।

जब देवी सती उस यज्ञ में पहुंची तो वहां उनके पिता दक्ष प्रजापति द्वारा भगवान शिव का घोर अपमान किया गया। अपने पिता के द्वारा पति के अपमान को देवी सती सहन नहीं कर पाई और यज्ञ के हवन कुंड में ही कूदकर उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। जब ये बात भगवान शिव को पता चली तो वो बहुत ज्यादा क्रोधित हुए और उन्होंने दक्ष प्रजापति से प्रतिशोध लेने का निर्णय किया और उस स्थान पर पहुंचे जहां ये यज्ञ हो रहा था।

उन्होंने अपनी पत्नी के मृत शरीर को निकालकर अपने कंधे में रखा और अपना विकराल रूप लेते हुए तांडव शुरू किया। भगवान शिव के गुस्से को देखते हुए भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ा जिससे देवी के शरीर के कई टुकड़े हुए जो कई स्थानों पर गिरे जिन्हें शक्ति पीठों के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि देवी सती की गर्भ और योनि यहां आकर गिरे है और जिससे इस शक्ति पीठ का निर्माण हुआ है, और यह कामाख्या देवी मन्दिर kamakhya devi mandir के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

कामाख्या देवी मंदिर से जुडी विशेष बात some important thing about kamakhya devi mandir

कामाख्या देवी मंदिर का बारे में एक बहुत ही रोचक बात  यह कहि जाती है की इस मंदिर में स्थापित देवी बहते हुए खून की देवी है. कामाख्या देवी मंदिर में देवी के गृभ और योनि को गर्भघर में रखा गया है जहाँ जून के महीने में रक्त परवाह होता है. कामाख्या देवी मंदिर के आसपास स्थित रहने वाले लोगो का कहना है की इस समय माता अपने मासिक चक्र में होती है. इसके साथ ही इस दौरान यहां स्थित ब्रह्मपुत्र नदी का रंग भी लाल हो जाता है.
यहां की निवासियों का यह भी कहना है कामख्या देवी मंदिर kamakhya devi mandir के पुजारियो द्वारा इस दौरान नदी में सिंदूर डाला जाता है. बहरहाल स्त्री का मासिक चक्र और ये मंदिर एक स्त्री की रचनात्मकता को दर्शाता है और ये बताता है की स्त्री ही इस ब्रह्माण्ड की जननी है और हमें उसका सम्मान हर हाल में करना चाहिए.


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