जब एक असुर हुआ माता कामख्या पर मोहित, विवाह के लिए माता ने राखी अनोखी शर्त | kamakhya temple story

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दोस्तों आज हम आपको kamakhya temple की story बताने जा रहे है. कामख्या मंदिर हिन्दुओ के प्रसिद्ध मंदिरो में से एक है जो माता कामख्या को समर्पित है. माता सती के 51 शक्तिपीठो में से इसे एक माना जाता है. माता कामाख्या के इस मंदिर में आपको उनके अलावा 10 अन्य शक्ति देवियो के भी दर्शन मिलेंगे ये 10 माता है देवी धूमावत्ती, मंतगी, बगोला, तारा कमला, भैरवी, चिनमासा, भुवनेश्वरी, तथा त्रिपुरा सिंदूरी आदि.

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एक बार नरक नाम के एक राक्षस की नज़र देवी कामख्या पर पड़ी तथा वह उनके मनभावन रूप पर मोहित हो गया. क्योकि देवी कामख्या नरक से विवाह नहीं करना चाहती अतः विवश होकर माता ने नरक के सामने एक शर्त रख दी. शर्त यह थी की अगर नरक एक रात में ही इस जगह पर मार्ग, घाट तथा मंदिर आदि बनवा दे तो वह उससे विवाह कर लेंगी.
नरक ने शर्त को पूरी करने के लिये विश्वकर्मा को बुलाया तथा काम शुरू कर दिया.
जब माता देखने लगी की काम तो अति शीघ्रता के साथ पूर्ण हो रहा है तो उन्होंने मुर्गे द्वारा सुबह होने की सुचना दिलवा दी जिसे कार्य पूर्ण नहीं हो पाया. आज भी उस पर्वत के निचे से ऊपर तक जाने वाला मार्ग नरकासुर के नाम से प्रसिद्ध है. जिस temple में माता kamakhya की मूर्ति स्थापित है वह कामदेव मंदिर कहा जाता है.
kamakhya temple के सम्बन्ध में यह कहा जाता है की नरकासुर के अत्याचारो से भक्तो का मंदिर तक पहुचना मुश्किल हो चुका था. इस बात से क्रोधित होकर ऋषि विशिष्ट ने इस मंदिर को श्राप दे दिया था. कहा जाता है की समय के साथ कामख्या मंदिर लुप्त हो चुका था.

16 वीं शताब्दी से जुडी kamakhya temple की story

एक अन्य मान्यताओ के अनुसार कहा जाता है की 16 वीं शताब्दी में कामरूप राज्य में अत्यंत भयंकर युद्ध होने लगे, इस युद्ध में कूचविहार रियासत के राजा जीत गए. युद्ध में विश्व सिंह के भाई खो गए थे और अपने भाई को ढंढने के लिए वे घूमते घूमते नीलांचल पववत पर पहुच गए.
वहां उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी. उस महिला ने राजा को इस जगह के महत्व और यहां कामाख्या पीठ होने के बारे में बताया. यह बात जानकर राजा ने इस जगह की खुदाई शुरु करवाई. खुदाई करने पर कामदेव का बनवाए हुए मूल मंदिर का निचला हिस्सा बाहर निकला. राजा ने उसी मंदिर के ऊपर नया मंदिर बनवाया.
कहा जाता है कि 1564 में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को तोड़ दिया था. जिसे अगले साल राजा विश्वसिंह के पुत्र नरनारायण ने फिर से बनवाया. इस प्रकार kamakhya temple का निर्माण हुआ.

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