लाल किताब से जुडी वास्तविक सच्चाई

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lal kitab के विषय में हमने कई बार सुना और पढ़ा है, ज्योतिष विद्या की अनेक शाखाओं में लाल किताब का नाम भी प्रमुखता के साथ शामिल है। लेकिन इन सबके बावजूद इस विद्या को लेकर हमारे मन-मस्तिष्क में बहुत सी भ्रांतियां मौजूद है। इसके अलावा लाल किताब से जुड़ी ऐसी कई जानकारियां हैं जो या तो हम तक पहुंची नहीं हैं और अगर पहुंची हैं तो आधी-अधूरी।
बहुत से विद्वान इसे उलझी हुई विद्या मानते हैं इसीलिए इसमें लिखी बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। उनका मानना है कि lal kitab की बातों को समझना आसान नहीं है, इसीलिए इससे बेहतर और सुलझी हुई विद्या की ओर रुख करना ही बेहतर है।
बाजार में लाल किताब में लिखी बातों को समझने वाले, लाल किताब के जरिए भविष्यवाणी करने का दावा ठोकने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे, लेकिन वास्तविक रूप में उन्हें लाल किताब की कितनी जानकारी है इस बात पर हमेशा संशय रहता है।
तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि सामान्य तौर पर lal kitab से जुड़ी क्या-क्या गलतफहमियां हमारे समाज में फैली हुई हैं, साथ ही यह जानने की भी कोशिश करते हैं कि वास्तव में लाल किताब है क्या।
सर्वप्रथम लाल किताब हिमाचल और उत्तरांचल के सुदूर पहाड़ी इलाकों में फैली विद्या थी, इसके बाद पंजाब और अफगानिस्तान तक यह विद्या अपने पांव पसारती गई। कहा जाता है कि यह विद्या एक परिवार के पास संरक्षित है। आज भी उस परिवार के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसे आगे बढ़ाते हैं।
यह विद्या उस परिवार तक कैसे पहुंची, इसके पीछे भी एक रहस्यमय कहानी है। ये कहानी तब की है जब आसमान से भविष्यवाणियां हुआ करती थीं कि ऐसा कार्य करेंगे तो नर्क की प्राप्ति होगी, ऐसा करोगे तो खुशहाली आएगी, वगैरह-वगैरह… बस इस परिवार के लोगों ने इसी भविष्यवाणी को लिखित दस्तावेज में तैयार किया है, जो आज lal kitab के नाम से प्रसिद्ध है।
lal kitab को “अरुण संहिता” मानने वाले भी बहुत से लोग आपको मिल जाएंगे। अरुण संहिता वो है जिसके आधार पर “रावण संहिता” का गठन हुआ था। अब ये बात कितनी सच है और कितनी मनगढ़ंत इस बात की जानकारी भी किसी को नहीं है।
ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो इसे पराशर संहिता के काल नियम पर आधारित ग्रंथ मानते हैं। दरअसल पराशर संहिता, ज्योतिष विद्या का एकमात्र सर्वस्वीकृत और सही ग्रंथ है।

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जो लोग lal kitab को समझने और इसके विषय में जानने का दावा करते हैं उनका मानना है कि वर्ष 1939 में पंजाब के रहने वाले पंडित रूपचंद जोशी ने ‘लाल किताब के फरमान’ के नाम से इसकी रचना की थी।
शुरुआती समय में इस किताब में 383 पृष्ठ थे, यह वो दौर था जब पंजाब में उर्दू भाषा का ही चलन था इसलिए इस किताब को भी उर्दू, अरबी और फारसी के मिश्रण के साथ लिखा गया था। इसके अरबी में लिखे होने की वजह से lal kitab को भी अरबी विद्या मान लिया गया, जबकि इसका सीधा संबंध भारत के पंजाब प्रांत से रहा।
ऐसा माना जाता है कि लाल किताब की रचना पराशर संहिता और प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर हुई है। इसके बाद वर्ष 1940 में 156 पृष्ठों के साथ इसे प्रकाशित किया गया जिसमें केवल कुछ खास सूत्र ही शामिल थे।
इसके बाद वर्ष 1941 में नए-पुराने सभी सूत्रों को संकलित करते हुए 428 पृष्ठों के साथ इसे पुन: प्रकाशित किया गया। इसके बाद वर्ष 1942 में 383 और 1952 में 1171 पृष्ठों के साथ इसे पुन: प्रकाशित किया गया।
लाल किताब में मौजूद सूत्रों का फलादेश आम ज्योतिष की तरह सहज और आसानी से समझा जाने वाला फलादेश नहीं है। सामान्य ज्योतिष से जुड़ी धारणाएं भी lal kitab से मेल नहीं खातीं इसलिए इसके फलादेशों को समझना हर किसी के बस में नहीं है, इसके लिए एक सही जानकार की आवश्यकता होती है।
lal kitab की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें मौजूद ऐसे उपाय जो सीधा ग्रहों को बांधने या उनके दुष्प्रभाव से बचाने का कार्य करते हैं। इसके अलावा लाल किताब का संबंध नाड़ी शास्त्र, काल नियम, सामुद्रिक शास्त्र और वास्तुशास्त्र से भी माना गया है।
आज बाजार में ‘लाल किताब के फरमान’ के नाम से lal kitab की बिक्री होती है, लेकिन इनमें से ज्यादातर किताबें ऐसी हैं जिन्हें केवल व्यवसायिक हित पूर्ति के लिए ही मार्केट में उतारा गया है।

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