भगवद गीता की इन पंक्तियों में छुपा हैं आपकी सभी समस्या का हल

जीवन में कई प्रसंग ऐसे आते हैं जब हमें समस्याएँ सुलझाने , स्वयं से लड़ने के लिए एक जीने कि इच्छा की आवशकता होती हैं. और जिसके लिए हमें स्वयं में एक ऊर्जा उत्पन्न करनी होती हैं. मानव जब तक निस्तेज हैं वह एक शव के सामान हैं. भगवद्गीता वर्तमान समय में मानव जीवन की समस्याओ को दूर करने का सूर्योदय हैं , जो न केवल हमें जीवन आधार प्रदान करती हैं. वरन आध्यात्म की तरफ भी जीवन को अग्रसर करता हैं. गीता में समस्याओ को बहुत ही सरल ढंग से परिभाषित किया गया हैं. और उनके समाधान के तरीके भी उतने ही सहज दर्शाये गए हैं , बस आवश्यकता हैं , उन्हें सही तरीके से जीवन में उतारने की. गीता में निहित इन तरीको को अपनाने से आप सुखद जीवन का अनुभव करेंगे.

“कर्म करने के लिए विजयी बनो ,विजयी होने के लिए कर्म नहीं”: किसी कार्य को करने का आनंद इस बात में निहित हैं कि आप कार्य को कितने उत्साह एवं एकनिष्ठ होकर करते हैं. सिर्फ परिणाम को सोचते हुए कर्म करना आपके उत्साह को क्षीण भी कर सकता हैं, और यह भय आपको की परिणाम आपके पक्ष में होगा या नहीं आपके कर्म को प्रभावित कर सकता हैं.कर्म करो फल की इच्छा मत करो ,इसका सारगर्भित अर्थ यही हैं कि आप आनंद का अनुभव करते हुए कर्म करो.उदहारण के तौर पर कवि अपनी कविता के प्रकाशन या आलोचना को ध्यान न रखते हुए सिर्फ कविता लिखते हुए आनंद कि अनुभूति करता हैं,और यही आनंद उसकी कविता का फल हैं.

“शत्रु स्वयं में हैं उसे बाहर न तलाशे ,स्वयं से युद्ध करने का साहस उत्पन्न करें”: मानव स्वाभाव सकारातमक नकारात्मक दोनों ही प्रवित्तियो का स्वामी हैं.और यही दोनों शक्तियाँ उसे सुमार्ग और कुमार्ग पर ले जाती हैं. अधिक अच्छाई भी हमारे अंदर दोष उत्पन्न कर सकती हैं,स्वयं पर अभिमान करने का. अर्जुन ने जब अपने सगे सम्बन्धियों से युद्ध करने में असमर्थता जताई, तो कृष्ण ने उसे भगवद्गीता कि गंगा से उसे स्वच्छ कर दिया और उसे प्रेरणा दी कि अपने विकारो से लड़ना ही स्वयं पर जीत हासिल करना हैं ,जो विकारो पर जीत हासिल नहीं कर सका वह जीवन में सुखी होते हुए भी दुखी हैं.

“त्वरित किसी परिणाम को न मान लें ,उसका शोध भी आवश्यक हैं”:किसी भी समस्याओ को सुलझाने चाहे वे स्वयं से जुडी हो या दूसरे से सम्बंधित हो ,सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह हैं कि आप ध्यान और पूरे मनोयोग से बातो को सुनें,त्वरित किसी परिणाम को बताकर किसी भी कार्य का मूल्यांकन करना कार्य के साथ अन्याय होगा.और सबसे महत्वपूर्ण पहलू जीवन में चुनौतियां कितनी भी हो,हम निराशा में भी ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ होकर दुःख में भी सुख कि अनुभूति करेंगें, समस्याओ का सही तरीके से मूल्यांकन हमें उनके सुखद पहलू के बारे में भी अवगत करता हैं.

“जीवन में स्पष्ट दृष्टिकोण आवश्यक हैं, गलत दृष्टिकोण विवेक को नष्ट करता हैं”: दुर्योधन और धृतराष्ट्र में सबसे समान पहलू ये था कि धृतराष्ट्र जन्म से जन्मांध थे दुर्योधन आँख होते हुए भी अंध था,क्योकि जब मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाये तो वह सही और गलत में भेद करने में असमर्थ हो जाता हैं, और यही दृष्टिहीनता उसके दुर्भाग्य का कारण बनती हैं.स्पष्ट दृष्टि हमें समस्या से लड़ने कि चुनौती देती हैं,जबकि गलत दृष्ट्रिकोंण हमें समस्याओं के चक्रव्यूह में डाल देता हैं.

भगवद्गीता को हम अविरल बहने वाली गंगा कहे तो कोई गलत नहीं होगा ,जो हमारे मलिन मन को स्वच्छ कर हमें एक पर आगे बढ़ने कि प्रेरणा देती हैं ,और हमारे दृष्टिकोण को सूर्य के तेज के समान साफ़ और हमारी दृष्टि को उज्जवल रहती हैं,एक स्वच्छ और स्पष्ट जीवन का आनंद लेने के लिए.

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