प्रेम और सौहार्द का पर्व हैं गणगौर

श्रद्धा, आस्था, प्रेम का प्रतीक माना जाने वाला गणगौर(Gangaur Festival 2018) राजस्थान में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा पर्व हैं,गणगौर पर्व चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की तीज को मनाया जाता हैं. यह पर्व शिव(गण) और (गौर) पार्वती को समर्पित हैं इस दिन कुवारी कन्याये मनचाहा वर पाने की कामना हैं.विवाहित महिलाये इस दिन गणगौर पूजन कर अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं. यह पर्व होली के दूसरे दिन से लेकर चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलने वाला 18 दिन का पर्व हैं.गणगौर(Gangaur Festival) के पर्व में पूरे राजस्थान में माता गणगौर की पूजा की जाती हैं.

गणगौर में लोकगीत गाये जाते हैं , जो इस पर्व की संस्कृति और परंपरा को दर्शाती हैं.इस पर्व में कन्याये और विवाहित महिलाये अपने अखंड सौभाग्य के लिए और अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि के लिए गणगौर की प्रार्थना और उनसे हर वर्ष आने का आग्रह करती हैं.

 

Gangaur ki puja ki samagri गणगौर पूजा की सामग्री:

1-लकड़ी की चौकी (Gangaur Pooja Samagri)
2-तांबे का लोटा /कलश
3-मिटटी / होली की रख
4-मिटटी के 2 कुंडे
5-मिटटी के दिए
6-रोली ,चावल, हल्दी,काजल .मेंहदी
7-घी
8-दूब, फूल ,फल,आम के पत्ते
9-नारियल
10-सुपारी
11-गणगौर के वस्त्र

 Gangaur puja vidhi पूजन विधि

विवाहित स्त्री 16 दिन गणगौर को बिठाती हैं, जिसमे विवाहित महिलाये , जिनकी शादी के बाद पहली हो वे होली हो वो अपने ससुराल या पीहर में 16 दिन की गणगौर(Gangaur puja vidhi) बैठाती हैं, गणगौर अकेले नहीं जोड़े के साथ पूजी जाती हैं. १६ कुंवारी कन्याओ को पूजा के लिए आमंत्रण दिया जाता हैं. गण गौर की पूजा में 16 दिन धूमधाम से गणगौर की पूजा की जाती हैं, होलिका दहन के दूसरे से दिन से होली खेली जाती हैं उस दिन से लेकर 16 दिन गणगौर की पूजा की जाती हैं.और अंत में उद्यापन कर विसर्जन कर दिया जाता हैं.

Gangaur Festival 2018

 

Gangaur vrat vidhi गणगौर व्रत विधि

1-चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को व्रती को स्नान करके गीले वस्त्रो में घर के किसी साफ और शुद्ध स्थान में रहकर लकड़ी से बनी टोकरी में जवारे बोने चाहिए
2-इस दिन से लेकर विसर्जन तक व्रती को एक समय ही भोजन करना चाहिए.
3-जवारे को ही शिव और गौरी का रूप माना जाता हैं.
4-इस दिन से लेकर विसर्जन तक माँ गौरी की विधि विधान से पूजा करनी चाहिए,और उन्हें प्रतिदिन भोग लगाना चाहिए
5-व्रत के दौरान एक चौकी पर पानी से भरा कलश उस पर आम के पत्ते और फिर नारियल रखना चाहिए , काली मिटटी से सोलह पीढ़ी बनाकर उन्हें चौकी पर रखना चाहिए , और अक्षत और रोली से पूजा करनी चाहिए.
6-सुहाग की सामग्री रोली,चन्दन,अक्षत , नैवेद्य को माँ गौरी को अर्पित करना चाहिए.
7-इस अवसर पर माँ गौरी को सुहाग की सामग्री , कांच की चूड़िया,माहवार ,सिन्दूर ,बिंदी, चूड़ी, शीशा , कंघी आदि अर्पित की जाती हैं.
8-माँ गौरी को चढ़ाये गए सिंदूर को विवाहित स्त्री को अपनी मांग में भरना चाहिए                                                9-चैत्र शुक्ल द्वितीय को गौरीजी को किसी नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर उन्हें स्नान कराएँ।
10-चैत्र शुक्ल तृतीया गौरी-शिव को स्नान कराना चाहिए और उन्हें सुन्दर वस्त्राभूषण पहनकर डोले या पलने में बिठाये.
11-इसी दिन शाम को गाजे-बाजे से नाचते-गाते हुए महिलाएँ और पुरुष भी एक समारोह निकालते हुए शोभायात्रा के रूप में गौरी-शिव को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर विसर्जित करें।

Gangaur Festival images

 

Gangaur ki Katha गणगौर की कथा

एक बार भगवान शंकर पार्वती जी एवं नारदजी के साथ भ्रमण पर जा रहे थे. वे चलते चलते चैत्र शुक्ल तृतीया को एक गाँव में पहुचे ,पार्वती और शिव के आने का समाचार सुनकर गांव की निर्धन स्त्रियाँ उनके स्वागत हेतु अक्षत और चन्दन लेकर पहुंच गयी , उनके भक्ति भाव से प्रसन्न होकर पार्वती ने सारा सुहाग रस उन पर छिडक दिया ।उन्हें अटल सुहाग और सौभाग्य का वरदान दिए , और वे स्त्रियाँ अपने घर लौट आयी.धनी वर्ग की स्त्रियाँ पकवानो को सोने चांदी के थालो में सजाकर ले आयी,इन स्त्रियाँ को देखकर भगवान् शंकर ने पार्वती से कहा- ”तुमने सारा सुहाग रस तो निर्धन वर्ग की स्त्रियों को ही दे दिया . अब इन्हें क्या दोगी“? पार्वतीजी बोली- प्राणनाथ! उन स्त्रियों को ऊपरी पदार्थो से बना रस दिया गया हैं । इसलिए उनका रस धोती से रहेगा . परन्तु मैं इन धनी वर्ग की स्त्रियों को अपनी अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग रस दूँगी जो मेरे समान सौभाग्यवती हो जाएँगी .

जब इन स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर लिया तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीरकर उस रक्त को उनके ऊपर छिडक दिया . जिस पर जैसे छीटें पडे उसने वैसा ही सुहाग पा लिया . इसके बाद पार्वती जी अपने पति भगवान शंकर से आज्ञा लेकर नदी में स्नान करने चली गई . स्नान करने के माँ पार्वती ने बालू की शिवजी की मूर्ति बनाकर पूजन किया । भोग लगाया तथा उसकी परिक्रमा की, और बालो के दो कणों का प्रसाद खाकर मस्तक पर टीका लगाया. उसी समय उस पार्थिव लिंग से शिवजी प्रकट हुए तथा पार्वती को वरदान दिया- ”आज के दिन जो स्त्री मेरा पूजन और तुम्हारा व्रत करेगी उसका पति चिरंजीवी रहेगा तथा मोंक्ष को प्राप्त होगा.

भगवान शिव यह वरदान देकर अन्तर्धान हो गए . इतना सब करते करते पार्वती जी को काफी समय लग गया . पार्वतीजी नदी के तट से चलकर उस स्थान पर आई जहाँ पर भगवान शंकर व नारदजी को छोडकर गई थी . शिवजी ने विलम्ब से आने का कारण पूछा तो इस पर पार्वती जी बोली, ” मेरे भाई- नदी किनारे मिल गए थे .उन्होने मुझसे दूध भात खाने तथा ठहरने का आग्रह किया । इसी कारण से आने में देर हो गई।“ ऐसा जानकर अन्तर्यामी भगवान शंकर भी दूध भात खाने क लालच में नदी तट की ओर चल दिए . पार्वतीजी ने मौन भाव से भगवान शिवजी का ही ध्यान करके अपनी अनन्य दासी की लाज रखने की प्रार्थना की “ प्रार्थना करती हुई पार्वती जी उनके पीछे पीछे चलने लगी . उन्हे दूर नदी तट पर माया का महल दिखाई दिया .

वहाँ महल के अन्दर शिवजी के साले तथा सहलज ने शिव पार्वती का स्वागत किया . वे दो दिन वहाँ रहे . तीसरे दिन पार्वती जी ने शिवजी से चलने के लिए कहा तो भगवान शिव चलने को तैयार न हुए . तब पार्वती जी रूठकर अकेली ही चल दी  ऐसी परिस्थिति में भगवान शिव को भी पार्वती के साथ चलना पडा . नारदजी भी साथ चल दिए .चलते चलते भगवान शंकर बोले, ” मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया . माला लाने के लिए पार्वतीजी तैयार हुई तो भगवान ने पार्वतीजी को न भेजकर नारद जी को भेजा . वहाँ पहुचने पर नारद जी को कोई महल नजर नही आया . वहाँ दूर दूर तक जंगल ही जंगल था .

सहसा बिजली कौंधी . नारदजी को शिवजी की माला एक पेड पर टंगी दिखाई दी . नारदजी ने माला उतारी और शिवजी के पास पहुँच कर यात्रा कर कष्ट बताने लगे . शिवजी हँसकर कहने लगे- यह सब पार्वती की ही लीला हैं .इस पर पार्वती जी बोली- मैं किस योग्य हूँ । यह सब तो आपकी ही कृपा हैं ,की आपने अपने भक्तों की लाज राखी. ऐसा जानकर महर्षि नारदजी ने माता पार्वती तथा उनके पतिव्रत प्रभाव से उत्पन्न घटना की मुक्त कंठ से प्रंशसा की .

You May Also Like