Oldest Shiv temple in India | भारत में स्थित प्राचीन शिव मंदिर

old shiva temple, oldest temple in india, biggest shiv temple in world

Oldest Shiv Temples in India

राजराजेश्वर शिव (oldest Shiv temples in India)अपने सरल और भक्तो पर जल्दी प्रसन्न होने के कारण तीनो लोको में वंदनीय हैं, शिव की पूजा ज्योतिर्लिंगों के रूप में की जाती हैं , जहा जहा उन्होंने अपने भक्तो की सहायता की वहा अपने भक्तो की प्रार्थना पर वे ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गए , और भक्तो द्वारा प्रदान किये नाम के साथ वह ज्योतिर्लिंग प्रसिद्द हो गया महादेव के 1008 नाम हैं, यहाँ उल्लिखित हैं शिव के भारत में स्थित प्राचीन मंदिर , जिनका वर्णन इस प्रकार हैं.

 

स्तंभेश्वर महादेव(Stambheshwar Mahadev Temple)

oldest Shiv temples in India

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर गुजरात के वडोडरा से 40 किलोमीटर की दूरी में स्थित शिव का यह मंदिर अपने आप में एक अनोखा तीर्थ हैं, यहाँ दिन में दो बार शिव मंदिर अंतर्ध्यान अर्थात गायब हो जाता हैं, आपको यह जानकार आश्चर्य होगा पर यह सत्य हैं, ऐसा अरब सागर में होने वाले ज्वर भाटे की वजह से होता हैं,इस मंदिर के निर्माण के पीछे जो कथा हैं वह ये हैं की इस मंदिर का निर्माण शिव पुत्र कार्तिकेय ने करवाया था.शिवपुत्र कार्तिकेय ने राक्षस ताड़कासुर का वध किया था, ताड़कासुर भगवन शिव का परम भक्त था , उसने कठिन तपस्या करके शिव को प्रसन्न किया और यह वरदान प्राप्त किया उसे शिवपुत्र ही मार सकता हैं वो भी 6 दिन का वरदान मिलने के पश्च्यात वह बहुत आतातायी हो गया ,परिणामस्वरूप शिव पुत्र कार्तिकेय ने मात्र 6 दिन की आयु ताड़कासुर का वध किया , पर बाद में उसे बहुत पछतावा हुआ की उसने शिव भक्त को मारा, विष्णु की सहायता से शिव ने वध स्थल पर शिव का मंदिर बनाया , यही मंदिर स्तंभेश्वर के नाम से जगत में प्रसिद्द हुआ.

 

काठगढ़ महादेव (Kathgarh Mahadev Temple )

हिमाचल प्रदेश को यही देवभूमि नहीं कहा जाता, वहा आस्था और भक्ति के अनेक केंद्र विद्यमान हैं.इन्ही में से एक हैं काठगढ़ महादेव का मंदिर , यह मंदिर अपने आप में यह अनूठा हैं यहाँ शिवलिंग दो रूपों माँ पार्वती और शिव के रूप में विद्ध्यमान हैं, इस शिव लिंग की विशेषता हैं ग्रीष्म ऋतू में यह अलग हो जाते हैं और शीत ऋतू में एक हो जाते हैं. इस शिवलिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रात्रि को हुआ था. 326 ईसा पूर्व जब सिकंदर ने पंजाब की भूमि में प्रवेश किया तो काठगढ़ में उसने इस स्थान में फ़क़ीर को पूजा में मग्न देखा, तो उसकी पूजा और विचारो से प्रभवित होकर सिकंदर ने यहाँ चारदीवारी का निर्माण कराया , बाद में राजा रणजीत सिंह ने यहाँ मंदिर का निर्माण कराया . शिवरात्रि के दिन यहाँ भारी मेला लगता हैं.शिव और पार्वती का अर्धनारीश्वर का रूप यहाँ आने वाले हर भक्त की पीड़ा को दूर करता हैं.

तामेश्वरनाथ धाम (Tameshwar Nath Dham)


गोरखपुर से 60 किलोमीटर की दुरी पर स्थित खलीलाबाद में स्थित तामेश्वरनाथ धाम बहुत ही प्राचीन मंदिर और सबकी मनोकामनाएं पूरी करने वाला मंदिर हैं, जंगलो के बीच बसे इस मंदिर की महिमा भी अनोखी हैं, पांडव जब अज्ञातवास् के लिए जा रहे थे माता कुंती ने यहाँ पर अपने पुत्रो के कल्याण के लिए यहाँ शिव की पूजा की थी. यहाँ प्राकृतिक रूप से निकले शिवलिंग की माता कुंती ने पूजा की थी. तभी से यहाँ बाबा तामेश्वर धाम की पूजा अर्चना की जाती हैं. भक्त लोग पावन नदी सरयू से जल भरकर लाते और यहाँ शिवलिंग पर चढ़ाते यहाँ घंटे चढ़ाये जाते हैं, खलीलाबाद के मुस्लिम शासक खलीलुर्रहमान ने यहाँ मंदिर को काफी नुक्सान पहुंचाने की कोशिश की परन्तु हर बार वह असफल रहा अंत में वह हाथ जोड़कर चला गया

श्रीखंड महादेव (Shrikhand Mahadev)

कुल्लू जिले में स्थित श्रीखंड महादेव के पावन धाम की चढ़ाई कैलाश मनसरोवर (kailash mansarovar yatra) की चढ़ाई से भी अधिक कठिन और दुर्गम हैं , कुल्लू के निरमंड से श्री खंड की यात्रा की 25 किलोमीटर की सीधी चढ़ाई साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं.यहाँ पर जाने का साहस व्यक्ति अपने जीवन में एक बार ही कर सकता हैं,.18 हजार की ऊंचाई में स्थित श्रीखंड धाम में माँ पार्वती , गणेश और कार्तिकेय जी की प्रतिमाये हैं, सुन्दर घाटियों के बीच से बने रास्ते से होकर श्रीखंड तक पंहुचा जा सकता हैं, श्रीखंड में स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई 72 फ़ीट हैं.यहाँ पर खच्चर , घोड़े की सुविधा भी उपलब्ध नहीं हैं , भक्तो को पैदल ही इस दुगम चढ़ाई पर चढ़ना होता हैं. यात्रियों को मेडिकल परीक्षण के उपरांत ही भक्तो को यात्रा पर जाने की अनुमति प्रदान की जाएगी.

 

कामेश्वर धाम(Kameshwar Dham)

बलिया जनपद में स्थित कामेश्वर धाम वही धाम हैं जहा भगवान् शिव ने अपने तीसरे नेत्र को खोलकर देवताओ के सेनापति काम देव को भस्म कर दिया, जिस वृक्ष के पीछे छुपकर कामदेव ने शिव पर पुष्प बाण चलाया था वह आम का वृक्ष आज भी हरा भरा हैं, इसके जड़ में देवताओ ने कामशिला खंड स्थापित किया ,देवी सती ने जब प्रजापति दक्ष के अग्निकुंड में अपना शरीर का त्याग किया था, उस घटना के बाद से शिव इस स्थान पर घोर समाधी में लीन हो गए , इधर ब्रह्मा जी से वरदान पाकर तारकासुर ने तीनो लोको में आतंक मचा दिया , वरदान के अनुसार तारकासुर को केवल शिवपुत्र ही मार सकता था.

इसलिए देवताओ ने शिव को समाधी से जगाने के लिए कामदेव को भेजा . इस स्थान पर मांगी जाने वाली मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं.यह स्थान मोक्ष्दायिनी हैं, इस कथा का और स्थान का उल्लेख वाल्मीकि रामायण(Ramayan) और शिव महापुराण में भी मिलता हैं, ताड़का के वध के लिए जब श्री राम वन की ओर जा रहे थे तब यही पर रूककर उन्होंने रात्रि विश्राम किया था.सावन मास के दौरान यहाँ का वातावरण शिवमय हो जाता हैं.

कामेश्वर धाम कई महान ऋषियों ओर तपस्वियों की कर्मस्थली भी रहा हैं , यहाँ दुर्वासा मुनि ने भी तप किया था .इस कारन इस स्थान का महत्व और भी अधिक हो जाता हैं. इसके अलावा यहाँ तीन शिवलिंग भी हैं जिनमे
कामेश्वर नाथ शिवलिंग , कमलेश्वर नाथ शिवलिंग और बालेश्वर नाथ शिवलिंग.

 

ममलेश्वर महादेव का मंदिर (Mamleshwer Mahadev Temple)

हिमाचल प्रदेश में स्थित ममलेश्वर महादेव का मंदिर पांडवकालीन मंदिर हैं ,इस मंदिर का सम्बन्ध शिव पार्वती दोनों से हैं,इस मंदिर में स्थापित पांच शिवलिंग का निर्माण पांडवो ने ही किया था, इस मंदिर की विशेषता यहाँ पर पुजारी के पास रखा पांडवो का वह गेहू का दाना हैं जिसका वजन 200 ग्राम हैं. पांडवो न अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ बिताया था.एक और विशेषता यहाँ लगातार जल रहा धुना हैं , जिसके बारे यह मान्यता हैं की यह महाभारत काल से लगातार जल रही हैं. अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवो ने यहाँ वास किया और यहाँ एक राक्षस का वध करके ग्राम को राक्षसो से मुक्त किया ,भीम की विजय को याद में ही यह धुना जल रहा हैं.

 

भीमा शंकर ज्योतिर्लिंग(Bhimashankar Temple)

भीमा शंकर मंदिर का वर्णन शिव पुराण में उल्लिखित हैं, जिसमे यह उल्लिखित हैं कि कुम्भकरण का एक पुत्र था भीम,जो अपने पिता कि मृत्यु के बाद पैदा हुआ था, जब उसे अपने पिता के वध कि कहानी अपनी माँ से पता चली तो उसने श्री राम के वध का निर्णय लिया.ब्रह्मा से वरदान पाकर भीम ने तीनो लोको में आतंक मचा दिया तब देवता भगवान् शिव के पास गए और प्रार्थना की , उनकी प्रार्थना सुनकर शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने भीम का वध किया , देवताओ ने भीम के वध के बाद शिव से वही ज्योतिर्लिंग के रूप में रहने की प्रार्थना की तो शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में वह स्थापित हो गए , यही स्थान भीमा शंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्द हुआ.

Read More

Significance of Jyotirlingas | 12 ज्योतिर्लिंगों का महात्मय

Shiva temples in world

 

You May Also Like