केरल का पवित्र सबरीमाला श्री अयप्पा का मंदिर

सबरीमाला(Sabrimala Temple) तीर्थ दुनिया के प्रसिद्द तीर्थो में से एक हैं.केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर पम्पा नामक स्थान से 4 -5 किलोमीटर दूर सह्याद्रि पर्वत के घने वनो के बीच स्थित हैं. यह मंदिर हरीहर पुत्र अयप्पन का मंदिर हैं (हरिहर- विष्णु के मोहिनी रूप धारण करने पर  मोहिनी और शिव के मिलन से जो पुत्र उत्पन्न हुआ) मलयालम में शबरीमाला का अर्थ हुआ ,पर्वत, वास्तव में या स्थान शबरीमला सह्याद्रि पर्वतमाला से घिरे हुए स्थान पर स्थित हैं.शबरीमाला तीर्थ किसी भी धर्म, संप्रदाय की विचारधारा से दूर एक अलग स्वस्थ विचारधारा का समर्थन करता हुआ हर धर्म जाति के व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश की इजाजत देता हैं.

इस मंदिर में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित हैं.इसके पीछे जो कारण हैं वो ये हैं कि अयप्पन ब्रह्मचारी थे इसलिए इस मंदिर में केवल वही स्त्रियाँ आ सकती हैं जो रजस्वला से मुक्त हो गयी हो या जो रजस्वला न हुयी हो.धर्म की दीवारों से दूर यह मंदिर सभी को समानता की नजरो से देखता हैं, जिसका उदहारण वावर नामक मुस्लिम अनुयायी का मकबरा हैं , जो यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित हैं , वावर अयप्पन का सहयोगी था , और यह मान्यता हैं की बिना वावर के मकबरे पर माथा टेके आपकी यात्रा अधूरी मानी जाएगी.दो विभिन्न मतों के बीच ऐसी धार्मिक सहिष्णुता का उदहारण शायद ही कही देखने को मिलता हैं.

अयप्पा मंदिर का इतिहास(Sabrimala Temple History)

अयप्पा मंदिर के इतिहास(Sabrimala Temple History) के बारे में यह कथा सामने आती हैं, माँ दुर्गा ने जब महिषासुर का वध किया तो उसके पश्च्यात महिषासुर की बहिन महिषी ने देवताओ से बदला लेने के लिए ब्रह्मा की तपस्या की. और उसने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया, वरदान को प्राप्त करते ही महिषी ने तीनो लोको में आतंक मचाना शुरू कर दिया.महिषी को वरदान था उसका वध हरिहर के पुत्र के हाथो होगा , भगवान विष्णु के मोहिनी रूप से शिव मोहनी के रूप से मुग्ध हो गए ,और विष्णु के मोहिनी और शिव के मिलन से अयप्पन का अवतरण हुआ .

अयप्पन को राजा पंडलम ने गोद लिया और उनका पालन पोषण किया, एक बार माँ की बीमारी के लिए अयप्पन शेरनी का दूध लेने जंगल में गए (वस्तुत यह उनकी माँ की चाल थी जिसके लिए उन्होंने अयप्पन को शेरनी का दूध लाने जंगल में भेजा था) और वही उन्होंने महिषी का वध किया. वापिस महल आने के पश्च्यात अयप्पन ने महल छोड़ने का निर्णय लिया और उन्होंने अपने पिता से पम्पा नदी के तट पर मंदिर बनाने का आग्रह किया और यही मंदिर शबरीमाला के नाम से विख्यात हुआ .केरल में अयप्पन भगवान में लोगो की बहुत बड़ी आस्था हैं.

अयप्पन भगवान की पूजा विधि

भगवान अयप्पन भगवान लोगो की आस्था और विश्वास के केंद्र हैं. केरल ही नहीं अपितु विश्व के कोने कोने जहा दक्षिण भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं ,वे सभी शबरीमाला के दर्शन के लिए आते हैं.इस मंदिर में दर्शन की विधि बहुत कठिन हैं, सर्वप्रथम तीर्थयात्री को पम्पा में स्नान करना होता हैं , पम्पा का महत्व दक्षिण भारत में गंगा के समान ही हैं, उसके पश्च्यात ही तीर्थयात्री शबरीमाला की और प्रस्थान करते हैं.

दर्शन से पूर्व 41 दिन तक आपको नियम और संयम से रहना , मॉस मदिरा का त्याग करना पड़ता हैं. शबरीमाला मंदिर तक आने के लिए पम्पा से पांच किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी होती हैं.मंदिर के प्रांगण ( गर्भग्रह )तक जाने के लिए 18 सीढिया पार करनी होती हैं , ये 18 सीढिया ज्ञान , अध्यात्म ,मनुष्यो की इन्द्रियों का प्रतीक हैं.

 

शबरीमाला के पावन मंदिर में महाशिवरात्रि को विशेष पूजा का आयोजन किया जाता हैं.अयप्पन भगवान को घी से स्नान कराया जाता हैं.जो भी भक्त शबरीमाला के दर्शन के लिए आते हैं, उन्हें इरुमुड़ी लेकर आना होता हैं जिसमे प्रसाद और भोजन की दो थैलिया होती हैं , जिसमे एक में नारियल जो घी से भरा होता हैं , दूसरे में भोजन सामग्री होती हैं, इस दौरान उन्हें एक वस्त्र या तो नीला या सफ़ेद रंग की धोती पहननी होती हैं.

ज्योति के रूप में भगवान अयप्पन प्रकट होते हैं

ऐसी मान्यता हैं भगवान अयप्पा यहाँ भक्तो को ज्योति के रूप में साक्षात् दर्शन देते हैं, यहाँ आने वाले भक्तो को रात में पहाड़ी के बीच पर ज्योति दिखाई देती हैं. यही ज्योति भगवान् अयप्पन हैं ,जो हमेशा सच्चे मन से आये भक्तो को दर्शन देती हैं.इस ज्योति को माकरा विलाकू कहते हैं.

भगवान् अयप्पन का स्वरुप

भगवान् अयप्पन के स्वरुप का अगर हम वर्णन करे प्रभु अयप्पन यौगिक मुद्रा में विराजमान रहते हैं , और अधरों पर हमेशा मुस्कान भरी रहती हैं. इनके गले में जन्म से ही भारी हार होने के कारण इन्हे मणिकनन्दन भी कहा जाता हैं. भगवान् अयप्पन का वाहन शेर हैं, तीर और धनुष इनके शस्त्र हैं.

 

शबरीमाला मंदिर केवल मलयालम महीनो में ही आम दर्शनार्थ हेतु खुला रहता हैं, बाकि पूरे साल यह तीर्थयात्रियों के लिए बंद रहता हैं.साल में दो बार 15 नवंबर और 14 जनवरी को ही मंदिर में भक्तो को प्रवेश की इजाजत हैं. और इस अवधि में भक्त भगवान अयप्पा को घी से स्नान कराते हैं, और मंत्रो का उच्चारण करते हैं.

 

पम्पा नदी से शबरीमाला तक की दूरी 5 किलोमीटर हैं , ओर यह यात्रा भक्तो पैदल ही तय करनी होती हैं (sabarimala hill walking distance)

 

सबरीमाला मंदिर की देखरेख करने वाले बोर्ड त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड ने शबरीमाला मंदिर का नाम बदल दिया हैं. उनका मानना हैं की अयप्पा स्वामी के कई मंदिर हैं, जिनमे :

1-सबरीमाला का अय्यप्पा स्वामी मंदिर

2-श्री धर्म शास्ता मंदिर

3-कुल्लाथूपूजाह मंदिर, केरल

4-आर्यकावु शास्ता मंदिर, केरल

5-अचनकोइल शास्ता मंदिर, केरल

लेकिन पवित्र धाम केवल शबरीमाला में ही स्थित हैं , इसलिए अब यह शबरीमाला श्री अयप्पा स्वामी मंदिर के नाम से ही जाना जायेगा . देवास्वोम बोर्ड के अंतर्गत 1248 मंदिरो की देख रेख का जिम्मा हैं.

18 सीढ़ियों की महत्ता /18 golden steps

भगवान अयप्पा के मंदिर में 18 सीढ़ियों (18 Golden steps) का बहुत बड़ा महातम्य हैं ये न केवल सीढिया हैं अपितु मानव के 18 लक्षण हैं 18 सीढिया प्रतीक हैं प्रथम 5 सीढिया मानव की पांच ज्ञानेन्द्रियो की और दर्शाती हैं, उसके बाद की 8 सीढिया मानवीय मन की भावनाओं उसकी इच्छाओ को प्रस्तुत करती हैं, इसके बाद की तीन सीढियां मानव के गुणों की ओर इंगित करती हैं, ओर अंत की 2 सीढ़ी मानव के ज्ञानता ओर अज्ञानता को दर्शाती हैं.

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