Significance of Jyotirlingas | 12 ज्योतिर्लिंगों का महात्मय

देवो में देव महादेव देश में 12 स्थानों पर स्वयंभू बनकर प्रकट हुए हैं, इन 12 ज्योतिर्लिंगों( Significance of Jyotirlingas) में शिव की शक्ति समाहित हैं,जो भी व्यक्ति इन 12 ज्योतिलिंगो का नाम लेता हैं, उसके सातो जनम के पाप नष्ट हो जाते हैं. इन बारह ज्योतिर्लिंगों में शिव ज्योतिपुंज के रूप में विराजमान हैं.जो यहाँ आने वाले हर भक्त को पापो से मुक्त करती हैं.

 

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग (Somnath Jyotirlinga)

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्वय चंद्रदेव द्वारा निर्मित 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम सोमनाथ ज्योतिर्लिंग अपने वैभव और समृद्ध इतिहास के लिए जाना जाता रहा हैं . महमूद गजनवी ने कई बार इसे लूटा और इस मंदिर पर तोड़फोड़ की, इस मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण होता रहा.

वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्रता के पश्च्यात लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने करवाया , और 1 दिसंबर 1995 को राष्ट्रपति डॉ शंकर दायक शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया.

पुराणों में सोमनाथ मंदिर को लेकर जो कथा मिलती हैं.वह यह हैं चंद्र का विवाह राजा दक्ष की सभी 27 पुत्रियों से हुआ था , लेकिन उनकी आसक्ति रोहिणी में अधिक थी.दक्ष के कई बार समझाने पर भी चंद्र नहीं मने तो दक्ष ने उन्हें श्राप दे दिया कि चंद्र कि शक्ति का धीरे धीरे क्षीण होती जाये. चंद्र ने शाप से मुक्त होने के लिए भगवान शिव कि आराधन की,और चंद्र की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे शाप मुक्त किया , चंद्र देव ने भगवान शिव के मन्दिर को यहाँ स्थापित किया , और नामकरण किया सोमनाथ अर्थात सोम (चंद्र के नाथ)के नाथ का मंदिर .

 

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga)

आंध्र प्रदेश के श्री शैलम पर्वत पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंग में दूसरे स्थान पर हैं ,एक महत्वपूर्ण बात यह हैं कि यहाँ न केवल ज्योतिर्लिंग बल्कि माँ का शक्ति पीठ भी हैं , मल्लिका का अर्थ हैं पार्वती और अर्जुन भगवान शिव को भी कहते हैं.इसलिए सम्मलित स्वरुप में इसका नाम हुआ मल्लिकार्जुन. मल्लिकार्जुन कि कहानी इस प्रकार से हैं, जब श्री गणेश और कार्तिकेय में विवाह को लेकर के बहस शुरू हो गयी की विवाह पहले कौन करेगा .

शिव ने कहा जो पृथ्वी कि परिक्रमा लगाकर सर्वप्रथम आएगा उसी का विवाह पहले कराया जायेगा , कार्तिकेय अपने वाहन मोर को लेकर पृथ्वी कि परिक्रमा करने निकल पड़े , इधर गणेश जी ने अपनी बुद्धि और तर्क का सदुपयोग करते हुए अपने वाहन मूषक से अपने माता पिता शिव और पार्वती की 7 बार परिक्रमा की, उनकी इस बुद्दिमता से प्रसन्न होकर भगवान ने गणेश का विवाह रिद्धि और सिद्धि दोनों से करा दिया.

जब ये सारा वृतांत कार्तिकेय को पता चला तो वे कैलाश से चले गए और क्रोंच पर्वत पर रहने लगे , कार्तिकेय को मनाने के लिए के लिए शिव और पार्वती भी कर्तिकेय के पास गए , जैसे ही कार्तिकेय को यह बात पता चली वे क्रौंच पर्वत छोड़कर वहाँ से तीन योजन दूर अन्य जगह पर चले गए , कार्तिकेय के जाने के पश्च्यात शिव क्रोंच पर्वत पर शिवलिंग के रूप में प्रकट हो गए . यही स्थान मल्लिकार्जुन के नाम से विख्यात हुआ .यहाँ पर शिव का पूजन करने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता हैं.

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (Mahakaleshwar Jyotirlinga)

कालो के काल महाकाल की महिमा जग वन्दित हैं. यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट पर स्थित हैं. महाकाल ने यहाँ भूषण राक्षस को मारकर लोगो की रक्षा की तब भक्तो के कहने पर शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे. यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग हैं ,जो दक्षिणमुखी हैं ( दक्षिण दिशा की ओर यहाँ शिवलिंग हैं, दक्षिण दिशा काल की मानी जाती हैं ) अर्थात जिसने काल को भी वश में कर लिया हो ,वही महाकाल हैं.

यहाँ शिव की भस्म आरती होती हैं.पूरे देश में केवल यही शिव की भस्म आरती होती हैं , इसके पीछे मान्यता हैं की शिव का श्रृंगार भस्म से किया जाता हैं.भस्म से शिव को जगाया जाता हैं, वर्षो पहले शमशान से मिली हुयी भस्म से शिव का श्रृंगार किया जाता था , पर अब यह परंपरा खत्म हो चुकी हैं. अब गोबर के कंडो, से यह आरती होती हैं , इस आरती को महिलाये नहीं देख सकती , इसलिए उन्हें घूँघट करना होता हैं. और इस आरती के दौरान पुजारी भी एक वस्त्र ( धोती ) में ही यह आरती करते हैं.

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (Omkareshwar Jyotirlinga)

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से 77 किलोमीटर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित हैं. मान्यता हैं शिव तीनो लोको में भ्रमण के पश्च्यात यहाँ विश्राम के लिए आते है. इसलिए यहाँ शिव की शयन आरती होती हैं..इस शिवलिंग के निर्माण के कथा के अनुसार एक बार नारद घूमते घूमते विन्धयाचल पहुंचे .

विंध्याचल ने नारद जी की सेवा की , और अपने वैभव का बखान करते हुए नारद से कहा बताइये मेरे पास किस चीज की कमी हैं , में सर्वगुणसम्पन्न हूँ . पर नारद बोले नहीं विंध्याचल तुम्हारे पास सब कुछ हैं पर मेरु पर्वत तुमसे अधिक ऊंचा हैं, उसकी शाखाये देवलोक तक पहुँचती हैं , तुम्हारे शिखर वहाँ तक नहीं पहुंच पाएंगे.

यह सुनकर विंध्याचल बहुत दुखी हो गया और वह विश्वनाथ की शरण में चला गया . उस स्थान पर पहुंचकर उसने शिव की मिटटी की शिवलिंग बनायीं और 6 महीने तक उसकी पूजा आराधना की.शिव उसकी पूजा से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे अभीष्ट सिद्दी का वर दिया,

उसी समय वहाँ निर्मित चित वाले ऋषि मुनि और देवता प्रकट हुए उन्होंने शिव को हमेशा लिए वही निवास करने के लिए कहा , यह सुनकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और वहाँ स्थित शिवलिंग दो रूपों में प्रकट हो गया .परमेश्वर लिंग ,ओमकार लिंग

 

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग (Kedarnath Jyotirlinga)

केदारनाथ 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख और पंच केदारो में इसकी गणना होती हैं. ये पंच केदार हैं-
केदारनाथ(Kedarnat Temple)तुंगनाथ ,रुद्रनाथ , मध्यमहेश्वर, कल्पेश्वर.इन पंच केदार में शिव स्वयंभू रूप में उपस्थित हैं.कहा जाता हैं. पांडवो की पीढ़ी में परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने केदारनाथ का निर्माण करवाया, 8 वी सदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोदार करवाया , वर्तमान मंदिर पांडवो द्वारा निर्मित मंदिर के साथ में स्थित हैं.यह की जलवायु प्रतिकूल होने के कारण यहाँ ६ महीने कपाट खुलते हैं और 6 महीने बंद होते हैं.केदारनाथ के पूर्व में ही श्री बद्री विशाल धाम(Shree Badrinath Yatra) स्थित हैं, और यह मान्यता हैं यदि बिना केदारनाथ का दर्शन किये बद्री विशाल के दर्शन कर लौट जाते हैं तो यात्रा का फल निष्फल हो जाता हैं .

 

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग (Rameshwar Jyotirlinga)

दक्षिण भारत के रामेश्वरम में स्थित शिव का यह ज्योतिर्लिंग बहुत ही पावन और विश्व प्रसिद्द धार्मिक स्थान हैं ,रामेश्वर अर्थात राम के ईश्वर. इसी के नाम पर यह स्थान रामेश्वर कहलाया,रावण को मारने के बाद राम ने इसी स्थान पर ब्रह्महत्या(Rameshwaram Mandir history)का प्रायश्चित्त किया था , और उन्होंने यहाँ शिवलिंग की स्थापना के लिए हनुमान जी को हिमालय से शिवलिंग लाने के लिए भेजा, किन्तु हनुमान जी को आने में देर हो रही थी और मुहूर्त बीत रहा था तो माँ सीता ने रेत से शिवलिंग का निर्माण कर दिया , तब श्री राम ने शिवलिंग की स्थापना कर इसकी पूजा कर दी, और इस शिवलिंग का नाम हुआ रामनाथ , तब हनुमान जी भी शिवलिंग ले आये, प्रभु राम ने उसी शिवलिंग के साथ ही इस शिवलिंग को ही स्थापित कर दिया उसे विश्वनाथ नाम दिया ,गर्भ गृह में ये दोनों शिवलिंग स्थित हैं.15 एकड में फैला रामेश्वर मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे बड़ा गलियारा हैं .

 

भीमा शंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirlinga)

मंदिर का इतिहास भीमा शंकर मंदिर का वर्णन शिव पुराण में उल्लिखित हैं, जिसमे यह बताया गया हैं कि कुम्भकरण का एक पुत्र था भीम,जो अपने पिता कि मृत्यु के बाद पैदा हुआ था, जब उसे अपने पिता के वध कि कहानी अपनी माँ से पता चली तो उसने श्री राम के वध का निर्णय लिया और ब्रह्मा जी कि तपस्या करने का निर्णय लिया , उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे विजयी होने का वरदान दिया , वरदान पाकर भीम निरंकुश हो गया , और उसने तीनो लोको में आतंक मचा दिया.और देवताओ को परेशान करना शुरू कर दिया , पूजा पाठ, यज्ञ , आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिया .

सभी देवता भगवान  शिव कि शरण में गए और उनसे राक्षस के अत्याचार से निपटने के लिए प्रार्थना की, शिव ने उन्हें वचन दिया की वे राक्षस का संहार कर उनके कष्ट दूर करेंगे , शिव ने राक्षस भीम का वध करके देवताओ का संकट दूर किया, देवताओ ने मिलकर शिव से यही रुकने की प्रार्थना की , और देवताओ की बात से प्रसन्न होकर शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में वही स्थापित हो गए , और यही स्थान भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्द हुआ..
नाना फडणवीस द्वारा बनाया गया एक बहुत बड़ा घंटा इस मंदिर की विशेषता हैं.इस मंदिर की सरंचना नागर शैली की हैं.मराठा शासक शिवजी ने इस मंदिर में बहुत सी सुविधाएं पूजा पाठ आदि के लिए बनायीं हैं.

 

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (vishvanath Jyotirlinga)


काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी कही जाती हैं, मान्यता हैं काशी नगरी शिव के त्रिशूल की नोक पर यह नगरी टिकी हुयी हैं.इस नगरी को लेकर यह मान्यता हैं कि प्रलयकाल में भी यह नगरी नष्ट नहीं होगी , शिव प्रलय काल के दौरान इसे अपनी त्रिशूल कि नोक पर धारण कर लेंगे और प्रलय के पश्च्यात वापस इसे धरा पर रख देंगे.

बाबा काशी विश्वनाथ का इतिहास कहता हैं कि शिव यहाँ विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में उपस्थित थे, और उनके मन में दो हो जाने कि इच्छा हुयी , इस प्रकार शिवलिंग दो रूप में शक्ति ,और दूसरे शिव , के रूप में यहाँ मौजूद हैं.मान्यता हैं शिव ने स्वयं से काशी का निर्माण किया और यहाँ विश्वेश्वर के रूप में उपस्थित हुए .

इंदौर की रानी अहिल्याबाई शिव की बहुत बड़ी भक्त थी, शिव ने उन्हें स्वपन में दर्शन दिए, तब रानी अहिल्याबाई ने 17 वी शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण कराया. राजा रंजीत सिंह ने इसके शिखर को सोने से बनाया , इस मंदिर को कई बार हानि पहुचायी गयी. वर्तमान में जो मंदिर हैं उसका निर्माण चौथी बार हुआ हैं.औरंगजेब के शासन काल में इसे बहुत हानि पहुचायी गयी.
काशी नगरी में विश्वनाथ का मंदिर एक संकरी गली में स्थित हैं , जो कई मंदिर और पीठो से घिरा हैं , गर्भगृह में विश्ववेश्वर ,राजराजेश्वर भगवान् शिव का शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित हैं.जिसे चाँदीसे मढ़ा हैं. काशी में पांच तीर्थ हैं,
दशाश्वेमघ
लोलार्ककुण्ड
बिंदुमाधव
केशव और
मणिकर्णिका
काशी का महिमामंडन जितना किया जाये उतना कम, यहां जो भी भी व्यक्ति प्राण त्याग करता हैं , उसे मोक्षदायिनी काशी नगरी मोक्ष प्रदान करती हैं, ऐसी मान्यता हैं प्राण त्याग करते समय स्वयं शिव उसके कान में तारक मंत्र  (श्री राम तारक मंत्र ) का उपदेश देते हैं.

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग (Trimbakeshwar Jyotirlinga)

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के पीछे जो कथा वर्णित हैं गौतम बुद्ध की पत्नी अहिल्या से उनके आश्रम में रहें वाली ऋषि पत्निया नाराज हो गयी, और उन्होंने अपने पतियों से गौतम ऋषि का अपकार करने के लिए कहा,मुनियो ने गणेश की आराधना की और अपनी बात बताई गणेश जी ने यह कहा की नहीं आप कोई दूसरा वरदान मांग लीजिये किसी के अहित की मांग उचित नहीं.पर मुनि अपनी बात पर अड़े रहे. विवश होकर गणेश जी ने अपने भक्तो की बात रखने के लिए एक दुर्बल गाय का रूप धारण किया और ऋषि गौतम के खेतो में घास चरने लगी ऋषि ने उसे तृण से हाका तो वह तृण के स्पर्श से ही मर गयी,यह देखकर सभी ने ऋषि पर गौहत्या का पाप लगा दिया.

ऋषि ने गौ हत्या के पाप से बचने हेतु हर कार्य किये , इसके बाद शिव की आराधना की , शिव गौतम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न हुए , और कहा की गौतम ऋषि इसमें आपका कोई दोष नहीं, में उन सारे ऋषियों , को दंड दूंगा ,उन्होंने छल किया हैं आपके साथ पर गौतम ऋषि बोले नहीं भोले उन्ही की वजह से आज मुझे आपके दर्शनों का पुण्य प्राप्त हुआ , आप मुझ पर यदि प्रसन्न हैं.तो सदा के लिए यहाँ विराजमान हो जाइये , शिव भक्त की बात सुनकर शिव वहाँ त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में अवस्थित हो गए , और मुनि के प्रताप से लायी गयी गंगा गोदावरी नदी के रूप में वहाँ विद्यमान हो गयी. गोदावरी को दक्षिण की गंगा कहा जाता हैं.

त्रयंबकेश्वर ब्रह्मगिरि की पहाड़ी की तलहटी में स्थित हैं.और इसी ब्रह्मगिरि पहाड़ी में गोदावरी का उद्गम स्थान हैं. इस मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य नाना साहब पेशवा ने किया , और इसमें 16 साल का समय लगा.
त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता हैं यहाँ शिव के साथ (ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनो के प्रतीक लिंग )के रूप में विराजित हैं. जो पूरे भारत में किसी भी ज्योतिर्लिंग में नहीं हैं. यहाँ इन्हे हीरे ,जवाहरात, और कीमती पत्थरो से जड़ित मुकुट पहनाया गया हैं. इस मंदिर में स्त्रियाँ केवल मुकुट का दर्शन ही कर सकती हैं.

 

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग (Vaidyanath Jyotirlinga)

 

बैद्यनाथ की कथा इस प्रकार से हैं , राक्षस राज रावण ने हिमालय में शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की , और शिव को अपने मस्तिष्क काट काट कर चढ़ाये,जब वह 9 वा सर काटने ही वाला था, शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे दसो सर वापिस कर दिए और उसे वरदान मांगने को कहा रावण ने वरदान में लिंग को लंका में स्थापित करने की और उसे ले जाने की अनुमति मांगी. शिव ने उसे आज्ञा दी की वह लिंग को ले तो जाये परन्तु यदि उसने लिंग को रास्ते में कही रखा , तो फिर वह लिंग वहाँ से नहीं हटेगा , वही स्थापित हो जायेगा.

मार्ग में शिवलिंग ले जाते समय रावण को लघु शंका जाने के निर्वित एक अहीर को वह लिंग को देकर लघु शंका के लिए चला गया , पर लिंग का भार समझकर उस अहीर ने उसे वही भूमि पर दिया और वापिस आने पर पूरे प्रयास से उसे उठाने का प्रयास किया , पर वह अपनी जगह से हिला भी नहीं, रावण ने शिवलिंग हाथ जोड़े और और वह लंका की और बढ़ गया ,सभी देवता और भगवान विष्णु ,ब्रह्मा जी ने उसकी पूजा अर्चना की और यही ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ के नाम से लोकप्रिय हुआ.
बैद्यनाथ धाम सभी मनोवांछित फल प्रदान करने वाला हैं.यह देवघर के नाम से लोकप्रिय हैं.देवघर अर्थात देवताओ का घर .इस मंदिर की एक और विशेषता यह हैं की शिव के सभी ज्योतिर्लिंगों में त्रिशूल लगे हुए हैं , पर यहाँ पंचशूल लगा हुआ हैं क्यूकि रावण पंचशूल से ही अपनी लंका नगरी की रक्षा करता था , क्युकी रावण द्वारा लाये गए शिव लिंग से ही बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग अस्तित्व में आया , यहाँ महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व पंचशूल की विशेष पूजा की जाती हैं

 

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (Nageshwar)

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग द्वारका क्षेत्र से 17 मील दूरी पर स्थित हैं, नागेश्वर अर्थात नागो के ईश्वर जो भगवन शिव हैं.नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी इस प्रकार से हैं ,सुप्रिय नाम का एक सदाचारी और शिवभक्त वैश्य था वह दिन रात शिव भक्ति में एकनिष्ठ रहता था. उसकी इस शिवभक्ति से दारुक नामका राक्षस बहुत क्रुद्ध रहता था , उसे उसकी शिवभक्ति से बहुत क्रोध आता था .वह हमेशा उसे कष्ट पहुंचाने की सोचता था , एक बार सुप्रिय नाव में बैठकर कही जा रहा था , यही मौका देखकर उसने नाव में अन्य यात्रियों सहित उसे अपने कारगर में बंद कर दिया .पर यहाँ भी उसने शिव भक्ति नहीं त्यागी वह शिव को ही स्मरण करता रहा .दुष्ट राक्षस को ने कहा हे वैश्य तू यहाँ भी दिन रात आँख बंद करके षड्यंत्र करने के बारे में सोच रहा हैं , और उसने अपने सेवको को उन्हें मारने की आज्ञा दी , पर इस बात से भी वह तनिक विचलित नहीं हुआ और उसने शिव का स्मरण जारी रखा उसी समय कारगर में एक चमकते हुए सिंहासन में शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपना पाशुपत अस्त्र प्रदान किया , इस अस्त्र से सुप्रिय ने राक्षस दारुक और उसके सहायक का वध किया , और फिर शिवधाम को चला गया .भगवन शिव के आदेशनुसार इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा.

 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (Ghrishneshwar Jyotirlinga)

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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग औरंगाबाद (महाराष्ट्र ) के नजदीक दौलताबाद से 11 किलोमीटर दूर वेरुलगाँव में स्थित हैं. प्रसिद्ध एलोरा की गुफाये इस ज्योतिर्लिंग के समीप ही स्थित हैं.देवी अहिल्याबाई होलकर ने इस ज्योतिर्लिंग का निर्माण कराया ,द्वादश ज्योतिर्लिंगों में यह सबसे अंतिम ज्योतिर्लिंग हैं.

इस ज्योतिर्लिंग की कहानी इस प्रकार से हैं, सुकर्मा नाम का एक सत्यनिष्ठ ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेश के साथ रहता था, दोनों ही शिव भक्त थे , परन्तु संतान ने होने की वजह से वह दोनों ही चिंतित थे.पत्नी के आग्रह पर सुकर्मा ने ने उसकी बहन घुस्मा से विवाह किया , जो परम् शिव भक्त थी, जो परम शिव भक्त थी, वह प्रतिदिन 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करती थी .और पूजन के पश्च्यात वह उन शिवलिंगो को पास में ही बने तालाब पर विसर्जित कर देती थी. शिव की कृपा से उसे एक स्वास्थ्य और सुन्दर पुत्र की प्राप्ति हुयी शिव की कृपा से उसे पुत्र की प्राप्ति हुयी, दोनों माएं पुत्र को प्राप्त कर बड़ी प्रसन्न हुयी ,

पर समय के साथ सुदेश के मन में नफरत जन्म लेनी लगी.एक दिन सुदेश ने मौका पाकर घुस्मा के पुत्र को मार डाला एयर उसे उसी तालाब में फेक आयी जहा घुस्मा पार्थिव शिवलिंग विसर्जित किया करती थी.पुत्र के मरने का समाचार सुनकर घर में हाहाकार मच गया , पर घुस्मा को कोई फरक नहीं पड़ा वह नित्य प्रति पूजा करने गयी, और ज्यू जी उसने पार्थिव शिवलिंग को तालाब में विसर्जित कर दिया , और जैसे ही वह बाहर आने लगी उसने देखा उसका पुत्र तालाब से बाहर आ रहा हैं .उसी समय शिव वहाँ प्रकट होने लगे , और उन्होंने सुदेश को मारने के लिए त्रिशूल निकला , परन्तु घुश्मा ने उसके अपराध को क्षमा करने के लिए भगवान से प्रार्थना की और हमेशा उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान रहने को कहा .यही स्थान घुश्मेश्वर के नाम से प्रसिद्द हुआ.

इन 12 ज्योतिर्लिंगों का दर्शन और स्मरण मात्र से ही मनुष्य समस्त पापो से मुक्त हो जाता हैं, कर उसे सहज ही शिव की भक्ति और कृपा मिल जाती हैं.12 ज्योतिर्लिंगों की यह महिमा इस श्लोक में भी वर्णित हैं,

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।

उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।

सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।

हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।

सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥

एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति।

कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥:

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