कौन है भद्रा ?, पढ़ें पौराणिक कथा

Ancient story about the sister of Lord Shani Dev !

shani sister bhadra

कौन है भद्रा ?

हिन्दू धर्म में ऐसा कहा जाता है की किसी कार्य को भद्रा योग (bhadraa yog) में शुरू करना नही करना चाहिए |  ऐसा करना अशुभ माना जाता है  भद्रा (bhadra) सूर्य देव (surya dev ) और माता’ छाया की पुत्री तथा शनि देव की सगी बहिन है| ऐसा माना जाता है कि भद्रा शनि देव से भी कड़क थी

Bhadra Shani Sister Story :

ऐसा माना जाता है कि दैत्यों को मारने के लिए भद्रा (bhadra) गर्दभ (गधा) के मुख और लंबे पूंछ और 3 पैरयुक्त उत्पन्न हुई। पौराणिक कथा के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य नारायण और पत्नी छाया की कन्या व शनि की बहन है।

भद्रा काले वर्ण, लंबे केश, बड़े दांत वाली तथा भयंकर रूप वाली कन्या है। जन्म लेते ही भद्रा यज्ञों में विघ्न-बाधा पहुंचाने लगी और मंगल कार्यों में उपद्रव करने लगी तथा सारे जगत को पीड़ा पहुंचाने लगी।

उसके दुष्ट स्वभाव को देखकर सूर्यदेव को उसके विवाह की चिंता होने लगी और वे सोचने लगे कि इस दुष्ट कुरूपा कन्या का विवाह कैसे होगा? सभी ने सूर्यदेव के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब सूर्यदेव ने ब्रह्माजी से उचित परामर्श मांगा।

bhadra-kaal

ब्रह्माजी ने तब विष्टि से कहा कि- ‘भद्रे! बव, बालव, कौलव आदि करणों के अंत में तुम निवास करो तथा जो व्यक्ति तुम्हारे समय में गृह प्रवेश तथा अन्य मांगलिक कार्य करे, तो तुम उन्हीं में विघ्न डालो। जो तुम्हारा आदर न करे, उनका कार्य तुम बिगाड़ देना।’ इस प्रकार उपदेश देकर ब्रह्माजी अपने लोक चले गए।

तब से भद्रा अपने समय में ही देव-दानव-मानव समस्त प्राणियों को कष्ट देती हुई घूमने लगी। इस प्रकार भद्रा की उत्पत्ति हुई।

Bhadra Dosh

शास्त्रों के अनुसार इस धरती पर bhadra सबसे जायदा अशुभ मानी जाती  है |  तिथि के पूर्वार्द्ध की दिन की भद्रा कहलाती है। तिथि के उत्तरार्द्ध की भद्रा को रात की भद्रा कहते हैं। यदि दिन की भद्रा रात के समय और रात्रि की भद्रा दिन के समय आ जाए तो भद्रा को शुभ मानते हैं।

भद्रा (bhadra) को विष्टि करण के नाम से भी जाना जाता  है। कृष्ण पक्ष की तृतीया, दशमी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, एकादशी के उत्तरार्द्ध में एवं कृष्ण पक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी, शुक्ल पक्ष की अष्टमी व पूर्णमासी के पूर्वार्द्ध में भद्रा रहती है।

भद्रा(bhadra) के दुष्प्रभावों से बचने का आसान उपाय है|

धन्या दधमुखी भद्रा महामारी खरानना।
कालारात्रिर्महारुद्रा विष्टिश्च कुल पुत्रिका।
भैरवी च महाकाली असुराणां क्षयन्करी।
द्वादश्चैव तु नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्।
न च व्याधिर्भवैत तस्य रोगी रोगात्प्रमुच्यते।
गृह्यः सर्वेनुकूला: स्यर्नु च विघ्रादि जायते। 

जब हनुमान जी ने शनिदेव को फेंका लंका से बहार !

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