सप्त पुरियो में पावन तीर्थ जगन्नाथ पुरी | जगन्नाथ की पावन स्नान यात्रा

Puri jagannath temple | Jagannath Puri Rath Yatra | Lord Jagannath mandir puri | Jagannath Temple History

जगन्नाथ मंदिर पुरी- Puri jagannath temple

उड़ीसा राज्य के पुरी नामक शहर में स्थित जगन्नाथ का मंदिर(Lord puri jagannath temple )भगवान कृष्ण को समर्पित एक हिन्दू मंदिर हैं. जगन्नाथ का अर्थ हैं जगत के स्वामी इसलिए इनकी नगरी को जगन्नाथपुरी या पुरी कहते हैं . हिन्दुओ के चार धामों में से एक जगन्नाथ पुरी भगवान जगन्नाथ उनके बड़े भाई बलभद्र ,और बहन सुभद्रा को सपर्पित यह पावन तीर्थ हैं.कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर भारत के भव्य मंदिरो में से एक हैं.

मुख्य मंदिर के शिखर पर भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र विराजित हैं. जो मंदिर की शोभा को बढ़ाता हैं.इस मंदिर में मनाया जाने वाला लोकप्रिय त्यौहार हैं भगवान् जगन्नाथ की रथ यात्रा (Jagannath Puri Rath Yatra) का.ये रथ यात्रा आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को आयोजित की जाती हैं.इस रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ और बलभद्र और बहन सुभद्रा को विशाल और भव्य रथ में बैठाकर सुन्दर रथ यात्रा निकली जाती हैं.

puri jagannath temple

 

मंदिर की अनूठी रसोई

puri jagannath temple images

जगन्नाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की रसोई हैं, यहाँ की रसोई विश्व की सबसे बड़ी रसोई हैं, यहाँ की रसोई में बनने वाले महाप्रसाद के बनने की विधि भी एकदम अनूठी प्रक्रिया हैं. यहाँ बर्तनो को एक के ऊपर एक रखा जाता हैं. सबसे पहले शीर्ष पर जो बर्तन रखा जाता हैं,उसमे भोजन पहले पकता हैं, उसके बाद अन्य बर्तनो में भोजन पकता हैं. इस विशाल रसोई में भगवान् जगन्नाथ के महाप्रसाद को बनाने के लिए 500 रसोईये और उनके साथ उनके 300 सहयोगी काम करते हैं.

महाप्रसाद- Mahaprasad

जगन्नाथ पुरी की और ख़ास बात यहाँ का महाप्रसाद होता हैं.इस महाप्रसाद को यहाँ की रसोई में ही तैयार किया जाता हैं जिसे दाल चावल के अलावा नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का विशेष प्रसाद होता हैं. जो बेहद कम दामों में यहाँ भक्तो को उपलब्ध कराया जाता हैं.

मंदिर से जुड़े कुछ रोचक पहलु-Intresting facts about Jagnnath Puri

10 वी शताब्दी में निर्मित जगन्नाथ मंदिर सप्त पुरियो में से एक हैं.ये सप्त पुरिया हैं अयोध्या (राम ) मथुरा (श्रीकृष्ण) काशी( शिव) हरिद्वार (विष्णु) उज्जैन (शिव) कांचीपुरम (पार्वती ) ये सप्त पुरिया भारत की सांस्कृतिक एकता और अखंडता का परिचय देती हैं.आइये जानते हैं भगवान जगन्नाथ से जुडी कुछ रोचक और अनूठी बातो के बारे में

जगन्नाथ पुरी में भगवान कृष्ण का विग्रह लकड़ी से निर्मित हैं , मान्यता हैं यह विग्रह लकड़ी का खोल मात्रा हैं इसके अंदर भगवान् कृष्ण मौजूद हैं

Intresting facts about Jagnnath Puri 

  • मंदिर के शिखर पर मौजूद झंडा हवा के हमेशा विपरीत दिशा में रहता हैं.
  • पुरी में हवा दिन में समुद्र की तरफ बहती हैं, और रात में मन्दिर की तरफ बहती हैं.
  • यहाँ के मुख्य गुम्बद की छाया जमीन पर नहीं पड़ती हैं.
  • यहाँ हजार से लेकर लाखो लोग भोजन करते हैं, पर भोजन की कमी कभी नहीं होती ,यहाँ का भंडार हमेशा भरा रहता हैं.
  • जगन्नाथ मंदिर की ये बात आश्चर्य जनक हैं कि, इस मंदिर के ऊपर से कोई पंछी नहीं गुजरता .

जगन्नाथ रथ यात्रा – Jagannath Puri Rath Yatra

Jagannath Puri Rath Yatra

पावन पुरी जगन्नाथ की यात्रा जगन्नाथ पुरी(About Jagannath Temple) द्वारा आयोजित यात्राओं में सबसे लोकप्रिय और परंपरागत महोत्सव में से एक हैं,इस यात्रा महोत्सव को देखने के लिए देश ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं.इस रथयात्रा का महोत्सव दस दिन का होता हैं,श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा में तीन रथ तैयार किये जाते हैं , जिनमे भगवान जगन्नाथ का रथ , श्री बलभद्र का रथ और बहन सुभद्रा का रथ .इन रथों का निर्माण लकड़ी से किया जाता हैं.

भगवान जगन्नाथ (का रथ का नाम गरुड़ध्वज या कपिलध्वज हैं, बलभद्र जी के रथ का नाम तलध्वज, और सुभद्रा जी के रथ का नाम देवदलन या पद्मध्वज हैं.आषाढ़ शुक्ल की द्वितीया को मंदिर से कुछ दूरी गुंडिचा मंदिर तक रथ को खींचा जाता हैं, इसके बाद 7 दिन तक भगवान् जगन्नाथ यही मंदिर में निवास करते हैं.आषाढ़ शुक्ल की दशमी को रथ यात्रा की वापसी होती हैं जिसे बाहुड़ा यात्रा कहा जाता हैं. प्रतिमाओं को मंदिर में वापिस लाने के उपरान्त गर्भगृह में वापिस रख दिया जाता हैं.

रथयात्रा का इतिहास- Jagannath Temple History

Jagannath Temple History

इस रथ यात्रा के पीछे जो कहानी हैं वह बहुत अनूठी हैं ,कहा जाता हैं एक बार सुभद्रा को नगर भ्रमण की इच्छा हुयी तो श्री कृष्ण ने सुभद्रा को रथ में बैठाकर पूरे नागर का भ्रमण कराया , इसी घटना की याद में हर वर्ष रथ यात्रा का आयोजन किया जाता हैं.

ऐसी मान्यता भी हैं कि कंस के वध के बाद श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलभद्र के साथ रथ में बैठकर मथुरा नगर का भ्रमण करते हैं.इस रथ यात्रा पर्व कि शुरुवात के पीछे यह भी मान्यता हैं कि कंस ने अपने भांजे श्री कृष्ण को गोकुल से मथुरा लाने के लिए रथ भेजा था , तो उसकी स्मृति में भी इस रथ यात्रा का आयोजन किया जाता हैं.

स्नान यात्रा- Snan Yatra

स्नान यात्रा- Snan Yatra

जगन्नाथ पुरी में रथ यात्रा की तरह स्नान यात्रा (Snana Yatra)का भी विशेष महत्व हैं , मान्यता हैं इस दिन भगवान जगन्नाथ के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता हैं. ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को स्नान यात्रा का आयोजन किया जाता हैं. इस प्रक्रिया के लिए श्री जगन्नाथ , बलभद्र और सुभद्रा को स्नान वेदी में लाकर स्नान कराया जाता हैं ,फिर उन्हें सामान्य जनता के दर्शनार्थ हेतु सुसज्जित किया जाता हैं, इस अवसर पर यहाँ आने वाले भक्तो का मानना हैं कि इस दिन भगवान जगन्नाथ के दर्शन करके सभी भक्तो के पाप धूल जाते हैं

lord jagannath snana yatra

स्कन्द पुराण में वर्णित कहानी के अनुसार राजा इन्द्रद्युम्न ने जब पहली बार भगवान कि मूर्तियों को स्थापित किया तब इस स्नान पर्व (lord jagannath snana yatra) का आयोजन किया, स्नान पर्व में में 108 घडो में अभिमंत्रित जल से भगवान जगन्नाथ श्री बलभद्र और बहन सुभद्रा के विग्रह को स्नान कराकर जनता के दर्शनों हेतु तैयार किया जाता हैं. यहाँ ऐसी मान्यता हैं स्नान पर्व के बाद भगवान् जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं, फिर उन्हें राज वैद्य के सरक्षण में रखा जाता हैं. इस अवधि को “अनासरा” कहा जाता हैं, इस अवधि में भगवान के दर्शन नहीं हो पाते हैं. भगवान् जगन्नाथ को इस अवधि में राजवैद्य द्वारा आयुर्वेदिक उपचार दिया जाता हैं .और दो हफ्तों की अवधि में भगवान ठीक हो जाते हैं.

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