शिव स्तुति से मिलती हैं संकटो से मुक्ति

शिव बहुत जल्दी(importance of shiv stuti) प्रसन्न होने वाले देव हैं, इसलिए ही उन्हें आशुतोष कहा जाता हैं. अनेक धर्मग्रथों में शिव से संबंधित अनेक स्तुतियाँ हैं, पर श्री राम के द्वारा रचित जो स्तुति हैं , जो रुद्राष्टकम के नाम से श्रीरामचरितमानस में वर्णित हैं, वह अपने आप में एक बहुत ही मधुर और लोकप्रिय रचना हैं, रुद्राष्टकम पढ़ने से शिव भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं. रुद्राष्टकम (importance of shiv stuti) के स्वर भी अत्यंत मधुर और कर्णप्रिय हैं. शिव सरल प्रवृति के हैं, उन्हें प्रसन्न करना बहुत आसान हैं, इसलिए उन्हें आशुतोष भी कहा जाता हैं.

 

anuradha paudwal shiv stuti

अनुराधा पोडवाल द्वारा बहुत ही मधुर और कर्णप्रिय स्वर में शिव स्तुति (रुद्राष्टकम ) गाया गया हैं . जिसका डाउनलोड लिंक नीचे दिया गया हैं.

 

importance of shiv stuti

शिव आशुतोष हैं , (importance of shiv stuti) शिव आशुतोष हैं , उनकी भक्ति भी सहज हैं, वे बहुत जल्द प्रसन्न होने वाले भगवान हैं, इसलिए आशुतोष हैं, शिव स्तुति से मनुष्य के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं, और समस्त प्रकार की सुख समृद्धि प्राप्त होती हैं, शिव का स्तुति गान करने से आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती हैं, रुद्राष्टकम शिव की बहुत ही मधुर और कर्णप्रिय स्तुति हैं, श्री राम ने युद्ध से पूर्व जब समुद्र तट पर शिव लिंग की स्थापना की तो उन्होंने शिव को प्रसंन्न करने के लिए शिव स्तुति का गान किया .

शिव स्तुति का गान करके मनुष्य को सभी संकटो से मुक्ति मिलती हैं. उनकी भक्ति भी सहज हैं, वे बहुत जल्द प्रसन्न होने वाले भगवान हैं, इसलिए आशुतोष हैं, शिव स्तुति से मनुष्य के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं, और समस्त प्रकार की सुख समृद्धि प्राप्त होती हैं, शिव का स्तुति गान करने से आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती हैं, रुद्राष्टकम शिव की बहुत ही मधुर और कर्णप्रिय स्तुति हैं, श्री राम ने युद्ध से पूर्व जब समुद्र तट पर शिव लिंग की स्थापना की तो उन्होंने शिव को प्रसंन्न करने के लिए शिव स्तुति का गान किया . शिव स्तुति का गान करके मनुष्य को सभी संकटो से मुक्ति मिलती हैं.

Benefits of shiv stuti

शिव स्तुति (Benefits of shiv stuti) मानव को सभी संकटो से दूर करती और उसे शुभ फल प्रदान करती हैं, शिव स्तुति का जाप करते रहने से मनुष्य को सुख समृद्धि की प्राप्ति होती हैं, शिव स्तुति का स्मरण मानव को गृहस्थी का सुख भी प्रदान करता हैं. शिव की स्तुति न केवल सुख सम्पन्नता बल्कि व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति भी प्रदान करती हैं. शिव पूजन अकाल मृत्यु से बचाता हैं. भोले बाबा सहज में ही प्रसन्न होने वाले भगवान हैं, उनकी भक्ति बहुत ही सरल हैं, भोले बाबा अपने भक्तो पर हमेशा ही करुणा बरसाते हैं.

शिव स्तुति (Shiv stuti in Sanskrit) का वर्णन तुलसीदास ने रामचरितमानस में बहुत ही सुन्दर शब्दों में किया हैं, जो बहुत ही मधुर और कर्णप्रिय हैं. शिव की इस स्तुति को रुद्राष्टकम के नाम से जाना जाता हैं, रुद्राष्टकम रामचरितमानस में संस्कृत में (Shiv Stuti lyrics) वर्णित हैं जो इस प्रकार हैं,

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

न यावत् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥

 

shiv tandav strot by ravan

शिव को समर्पित सभी शिव स्तुति में शिव तांडव (shiv tandav strot by ravan) स्त्रोत भगवन शिव को अत्यंत प्रिय हैं , शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करने से व्यक्ति को सुख वैभव और समपन्नता की प्राप्ति होती हैं, और व्यक्ति का व्यक्तित्व आत्मविश्वास से पूर्ण होता हैं, और उस पर भगवन शिव की कृपा हमेशा बानी रहती हैं.

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥

॥ इति श्री रावणकृतम् शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

शिव भोलेनाथ हैं उनकी भक्ति और स्तुति से वे सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं, और अपने भक्तो को सदैव सुख समृद्धि और वैभव प्रदान करते हैं, भोले बाबा सहज ही प्रसन्न होने वाले देव हैं , रावण ने शिव तांडव स्त्रोत्र का जाप कर भोले बाबा को प्रसन्न कर दिया , और भोले बाबा ने रावण को सहज ही अपनी भक्ति प्रदान की थी.शिव का जाप मनुष्य को संकटो से मुक्त करता हैं. और मनुष्य को मानसिक शांति प्राप्त होती हैं.