जाने एक भिखारी ब्राह्मण कैसे बना धन का देवता, पुराणों में छिपी कुबेर देव की एक अनसुनी कथा !

आज हम आपको कुबेर देव के पूर्व जन्म से जुडी एक कथा के बारे में बताने जा रहे है की आखिर कैसे एक गरीब ब्राह्मण, देवताओ का कोषाध्यक्ष व धन का देवता बन जाता है. शिव पुराण की एक कथा के अनुसार अपने पूर्व जन्म में कुबेर देव एक गुणनिधि नामक ब्राह्मण थे.

अपने बालपन में पिता द्वारा उन्होंने धर्म शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण करी लेकिन धीरे धीरे गलत मित्रो के संगति के कारण उनका ध्यान धार्मिक कर्म कांडो से हटकर जुआ खेलने तथा चोरी करने में लगने लगा. गुणनिधि ने धर्म से विमुख होकर अब आलस्य को अपना साथी बना लिया था.

इस तरह धीरे-धीरे समय बीतता रहा एक दिन गुणनिधि के पिता ने अपने पुत्र से दुखी होकर उसे घर से बाहर निकाल दिया. अब वह घर से निकाला हुआ बेसहारा एवं असहाय ब्राह्मण था. वह लोगो के घर जा जाकर भोजन मांगता.

एक दिन वह भोजन की तालश में गांव गांव भटक रहा था परन्तु उस दिन उसे किसी ने भोजन नहीं दिया. दुखी होकर गुणनिधि इधर उधर भटकते हुए वन की ओर जा पहुंचा. भूख व प्यास से उसका बुरा हाल हो रहा था.

तभी उसे कुछ ब्राह्मण अपने साथ भोग की सामग्री ले जाते हुए दिखाई दिए. भोग सामग्री को देख गुणनिधि की भूख और अधिक बढ़ गई तथा वह भी उन ब्राह्मणो के पीछे पीछे चल दिया.

ब्राह्मणो का पीछा करते करते गुणनिधि एक शिवालय आ पहुंचा. उसने देखा मंदिर में ब्राह्मण भगवान शिव के पूजा कर रहे थे.भगवान शिव को भोज अर्पित कर वे भजन कीर्तन में मग्न हो गए.

उधर गुणनिधि भी इस ताक में था की आखिर कैसे उसे भोजन चुराने का मौका मिले.

गुणनिधि को यह मौका मिला रात्रि के समय. रात्रि के समय भजन कीर्तन की समाप्ति के बाद सभी ब्राह्मण सो गए तथा गुणनिधि को बस इसी मोके का इन्तजार था.

वह चुपके से दबे पाँव भगवान शिव के प्रतिमा के समीप गया तथा वहां से भोग के रूप में रखा प्रसाद चुराकर भागने लगा. परन्तु भागते समय गुणनिधि का एक पाँव किसी ब्राह्मण पर लग गया तथा वह चोर चोर चिल्लाने लगा. गुणनिधि जान बचाकर भागा परन्तु नगर के रक्षक का निशाना बन गया तथा उसकी मृत्यु हो गई.

परन्तु अनजाने में गरीब ब्राह्मण गुणनिधि से महाशिवरात्रि के व्रत का पालन हो गया तथा वह उससे प्राप्त होने वाले शुभ फल का हकदार बन गया. उस व्रत के फलस्वरूप अपने अगले जन्म में गुणनिधि कलिंग देश का राजा बना.

अपने इस जन्म में गुणनिधि भगवान शिव का परम भक्त था वह सदैव भगवान शिव की भक्ति में खोया रहता. उसकी कठिन तपस्या को देख भगवान शिव उस पर प्रसन्न हुए तथा उसे वरदान स्वरूप यक्षों का स्वामी तथा देवताओ का कोषाध्यक्ष बना दिया.

इस प्रकार गरीब ब्राह्मण गुणनिधि से वह धन के देवता कुबेर बने.