हनुमान जी की माता अंजना ने जब एक तपस्वी को मारा पत्थर, हनुमान जी ने ऐसे बचाया उस तपस्वी के श्राप से अपनी माता को.. !

हनुमान जी की माता पूर्व जन्म में इंद्रलोक की एक अप्सरा थी तथा उनका नाम पुन्जिकस्थला था. जब पुंजिकस्थल अपने बालावस्था में थी तो वह काफी नटखट एवं शरारती थी. अपने बालपन के नादानी में एक बार वह बहुत बड़ी भूल कर बैठी.

पुन्जिकस्थला अक्सर पृथ्वी लोक की सुंदरता निहारने एवं अपने सखियो के साथ खेलने इंद्रलोक से पृथ्वी में आया करती थी. एक बार पुन्जिकस्थला पृथ्वीलोक में बिना अपने सखियो के घूमने आई.

पृथ्वी के जिस स्थान पर वह उतरी वहां एक तेजस्वी ऋषि तपस्या में लीन था. उस ऋषि ने वानर का रूप धारण किया हुआ था.

पुन्जिकस्थला उस ऋषि के रूप को देख आश्चर्य में पड़ गई की आखिर एक वानर कैसे तपस्या कर सकता है. उसे घोर तपस्या करते वानर को देख अपनी आँखों में विश्वास नहीं हो रहा था.

वह सोचने लगी की यह वानर अवश्य ही तपस्या की मुद्रा में गहरी नींद सो रहा है.

तब पुन्जिकस्थला ने अपने मन में कहा की क्यों न इस वानर को जगाया जाए. फिर क्या था पुन्जिकस्थला ने अपने आस पास पड़े पत्थरों एवं फलों को एकत्रित किया तथा उनसे ऋषि पर प्रहार करने लगी.

उन प्रहारों से ऋषि को चोटे आने लगी तथा उनकी तपस्या भी भंग हो गई. इसके फलस्वरूप ऋषि अत्यन्त क्रोधित हो गए तथा जब उन्होंने पुन्जिकस्थला को अपने समीप देखा तो वह उसे श्राप देते हुए बोले की

उद्दण्त, मुर्ख बालिका… तू एक वानर के समान चंचल है, अतः जब भी तुझे किसी पुरुष से प्रेम होगा और उसने तुझे देख लिया तो तुम उसी क्षण वानरी हो जाओगी.

पुन्जिकस्थला ने जब उन ऋषि को उनके वास्तविक रूप में देखा तो उन्हें अपने अपराध का बोध हो गया, अपने कृत्य पर पुन्जिकस्थला बहुत दुखी हुई तथा वह ऋषि से क्षमायाचना मांगने लगी व उनके सम्मुख गिड़गिड़ाने लगी.

अंत में ऋषि को पुन्जिकस्थला पर दया आ गई और उन्होंने पुन्जिकस्थला से कहा की पुत्री एक बार दिया गया श्राप कभी वापस नहीं लिया जा सकता परन्तु हां वानरी के रूप में भी तुम बहुत आकर्षक दिखोगी.

इतना कहकर ऋषि वहां से चले गए. कुछ दिन बाद भगवान इन्‍द्र, पुंजिकस्‍थला की सेवा से अति प्रसन्‍न हुऐ और कहा- मैं तुम्‍हारी सेवा से अतिप्रसन्‍न हू. मांगो क्‍या वर मांग‍ती हो.

पुंजिकस्‍थला ने अपने बालपन में हुए अपराध और ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के बारे में भगवान इंद्र को बताया और कहा- यदि आप मेरी सेवा से प्रसन्‍न हैं, तो कृपा कर कोई ऐसा उपाय बताऐं, जिससे मुझे इस श्राप से मुक्ति मिल जाए.

इंद्र देव बोले इसके लिए तुम्हे पृथ्वी लोक में जन्म लेना होगा तथा जब भगवान शिव का अंश तुम्हारे द्वारा जन्म लेगा तुम इस श्राप से मुक्ति पा जाओगी. पुन्जिकस्थला ने देवराज इंद्र के कहे अनुसार पृथ्वी लोक में एक ऋषि के यहाँ अंजना के रूप में जन्म लिया.

एक दिन वन में भ्रमण करते हुए अंजना ने केसरी को देखा, वे उनके रूप को देख कर मन्त्र मुग्ध हो गई. उधर जैसे ही केसरी की भी दृष्टि अंजना पर पड़ी तो ऋषि का दिया श्राप सच हो गया तथा अंजना का रूप वानरी का हो गया. परन्तु उस रूप में भी वह आकर्षित दिख रही थी.

उनके रूप को देख केसरी जी मोहित हो गए तथा उन्होंने अंजना से विवाह कर लिया. केसरी राज के साथ विवाह रचा कर अंजना ने भगवान शिव के अंश हनुमान जी को जन्म दिया. हनुमान जी भगवान शिव के 11 वे रूद्र अवतार है. हनुमान जी के जन्म के साथ ही माता अंजना भी श्राप मुक्त हो गई.

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