इस सत्य को जान हो जाओगे हैरान, महाभारत में पांडवो के ज्येष्ठ भ्रात युधिस्ठर ने एक नहीं कहे थे 15 असत्य !

महाभारत की कथा एवं इसमें उपस्थित अनेक ऐसे पात्र है जिनके जीवन से हमे प्रेरणा एवं बहुत कुछ सिखने को मिलता है. जैसे की महाभारत में कर्ण का पात्र हमे बताता है की कैसे इस संघर्ष भरे जीवन को जीना चाहिए, अर्जुन का पात्र हमें अपने लक्ष्य में फॉक्स रहने की बात सीखता है वही पांडवो के ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठर के जीवन से हमे धर्म एवं सत्य के मार्ग में चलने की प्रेरणा मिलती है.

धर्मराज पुत्र युधिस्ठर अपने पूर्व जन्म में यमराज थे तथा एक श्राप के कारण उन्हें धरती में जन्म लेना पड़ा था. महभारत के इस प्रसिद्ध पात्र के एक असत्य के बारे में तो हर किसी को पता होगा की उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर अश्वथामा की मृत्यु की खबर अपने गुरु दोणाचार्य को सुनाई ताकि उनका वध करने में अर्जुन को आसानी हो सके.

युधिस्ठर द्वारा बोला गया यह असत्य आधा सत्य एवं आधा असत्य के रूप में लिया गया. क्योकि अश्वथामा की मृत्यु हुई थी परन्तु गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा की नहीं बल्कि एक हाथी की जिसका नाम अश्वथामा था.

यह खबर सुनकर गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र को लगा की उनके पुत्र अश्वथामा की मृत्यु हो चुकी है. जिस कारण वे शोकवश भूमि पर गिर पड़े तथा उसी दौरान उनका वध कर दिया गया.

क्या आप को पता है इस आधे असत्य के अलावा भी युधिस्ठर ने 15 असत्य और बोले थे. जब पांडव चोपड़ के खेल में दुर्योधन से अपना सब कुछ हार चुके थे तब इसी खेल कारण उन्हें 14 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भी मिला था. अपने अज्ञात वास के दौरान युधिस्ठर ने अपनी वास्तविकता छुपाते हुए विराट में शरण ली थी. विराट के राजा ने जब युधिस्ठर से उनका परिचय पूछ तो युधिस्ठर ने उनके सामने 7 असत्य कह डाले.

विराट के राजा के समाने अपना परिचय देते हुए युधिस्ठर बोले मेरा नाम कनक है. में एक ब्राह्मण हु. वेयघरा नाम के ब्राह्मण परिवार से संबंधित हु. में युधिस्ठर का मित्र हु. में पाशे खेलने में कुशल हु. में एक सुदूर नगर से आया हु. साथ ही उन्होंने अपने परिवार के संबंध में भी असत्य बाते बतलाई.

इसके अलावा अपने चारो भाइयो का परिचय देते हुए युधिस्ठर ने चारो भाइयो और पत्नी का नाम असत्य बतलाया. इस तरह युधिस्ठर ने 5 असत्य बोले इसी के साथ युधिस्ठर ने अपने भाइयो के विषय में कहा इनसे मेरा कोई संबंध नहीं ही परन्तु हम एक दूसरे से परिचित है. इस प्रकार धर्मराज युधिस्ठर ने दो और असत्य बोल दिए.

अंतिम असत्य बोलते हुए युधिस्ठर ने विराट राजा से कहा की उन्हें कई राजदरबार में काम करने का अनुभव है;. महाभारत के विराट पर्व में विराट एवं धर्मराज युधिस्ठर के मध्य हुई वार्तालाप का प्रमाण मिलता है. इसी के साथ पांडवो के अज्ञातवास से जुडी अनेको घटनाएं भी इस पर्व में मिलती है.

हालाकि युधिस्ठर के द्वारा कहे गए इन असत्यों के संबंध में लोगो की अलग अलग मान्यताएं है परन्तु ऐसा कहा गया है की यदि धर्म की रक्षा के लिए ऐसा असत्य बोला जाए की किसी की हानि न हो तो उसे असत्य के श्रेणी में नहीं रखा जाता.