श्री शनिदेव की ढईया

shani dev ki dhaiya

shani dev ki dhaiya :

भगवान शंकर जब गणों को कार्य सौंप रहे थे उस समय उन्हेंने शनिदेव को अधिकार दिया कि वे दुष्ट व्यक्तियों को दण्ड देंगे। शनि उस दिन से धरती पर ही लोगों को कर्म के अनुरूप दंड देते हैं। साढ़े साती और ढईया शनि के दंड का स्वरूप है | जब शनि की दशा शुरू होती है तब राजा को भी रंक बना देती है और पराक्रमी भी निर्बल होकर दया की भीख मांगने लगता है ऐसी ही महिमा है शनिदेव की। शनि की दशा से पांडव और भगवान राम भी जब नहीं बच पाये तो हम सामान्य मनुष्य की क्या बिसात है।

शनिदेव की इसी महिमा के कारण हम मनुष्य शनि से भय खाते हैं।शनि की दशा काफी लम्बे समय तक रहती है क्योंकि सभी ग्रहों में इनकी गति धीमी है। जब किसी व्यक्ति के जीवन में शनि की दशा शुरू होती है तो कम से कम उसे ढ़ाई वर्ष तक कठिन और विषम परिस्थितियों से गुजरना होता है इस ढ़ाई वर्ष की अवधि को ढ़ईया कहा जाता है। शनि की दूसरी दशा है साढ़े साती जिसे बहुत ही कठिन और दु:खद माना जाता है इस दशा के दौरान व्यक्ति को साढे सात साल तक दु:खमय जीवन जीना पड़ता है।

शनि की इन दो दशाओं में से हम ढ़ईया को अपना विषय वस्तु बनाकर आपसे बातों का सिलसिला आगे बढ़ते हैं। ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार जब गोचर में शनि किसी राशि या आठवें भाव में होता है तब ढैय्या लगता है। कुछ ज्योतिषशास्त्री इसे लघु कल्याणी ढईया के नाम से भी संबोधित करते हैं।

shani dev ki dhaiya :

आमतौर पर ढईया को अशुभ फलदायी कहा गया है, परंतु यह सभी स्थिति में अशुभ नहीं होता। कुछ स्थितयों में यह शुभ और मिला जुला फल भी देता है. ज्योतिषशास्त्र कहता है अगर कुण्डली में चन्द्र और शनि शुभ स्थिति में है तो ढ़इया के दौरान आपके जीवन में कष्ट की अपेक्षा सुख का प्रतिशत अधिक होगा, कुल मिलाकर कहें तो ढ़ईया के कुप्रभाव से आप काफी हद तक बचे रहेंगे।

ज्योतिषशास्त्र में शनि ग्रह की तीसरी, सातवीं व दसवीं दृष्टि पूर्ण दृष्टि कही गयी है। शनि के विषय में कहा जाता है जब शनि किसी राशि से चौथे स्थान पर होता है तब शनि अपनी दृष्टि द्वारा उस राशि से छठे स्थान, दशम स्थान तथा जिस राशि में होता है उस राशि को अपनी दृष्टि से प्रभावित करता है। शनि की दृष्टि से प्रभावित होने पर जीवन में उथल पुथल मच जाता है।

जीवन में आये उथल पुथल का कारण यह है कि प्रभावित छठा स्थान रोग, शत्रु का घर होता है। दशम स्थान आजीविक, व्यवसाय व कर्म का घर और दूसरा घर धन का स्थान होता है चतुर्थ स्थान सुख का होता है। पंचम स्थान पुत्र व उच्च शिक्षा का होता जिनके प्रभावित होने से व्यक्ति परेशान हो जाता है।

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