जानिये कोणार्क मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य

उड़ीसा राज्य के पूरी नामक नगर में स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर(Sun temple konark orissa) 13 वी शताब्दी में निर्मित हैं.इस सूर्य मंदिर को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी हुयी हैं. सूर्यदेव के रथ में आकर में बने हुए इस सूर्य मंदिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने कराया था. पत्थर से बने हुए घोड़े और पहिये बरबस ही आपका ध्यान अपनी और आकृष्ट कर लेते हैं,इनमे जो बेहतरीन नक्काशी और कारीगरी की गयी हैं.

वैसा शायद ही कही देखने को मिले. पर यहाँ जो सूर्य प्रतिमा थी उसे अब जगन्नाथ पूरी में सुरक्षित रखा गया हैं.यहाँ अब कोई मूर्ति नहीं हैं.मंदिर को रथ का आकार दिया गया हैं, जिसमे 24 एक जैसे पत्थर लगाए गए हैं, सप्ताह के सात दिनों को दर्शाने के लिए सात घोड़े जो रथ को खींचते हुए प्रतीत होते हैं. मन्दिर में नृत्य करती हुयी युवतिया,और कलाकृतिया मंदिर को भव्य रूप प्रदान करती हैं .

कोणार्क सूर्य मंदिर(Konark Temple)

Konark temple
Konark temple

कोणार्क दो शब्दों के मेल से बना हैं अर्क अर्थात सूर्य, कोण अर्थात कोना या किनारा .कोणार्क सूर्य मंदिर पूरी के उत्तरी पूर्वी तट पर किनारे बना हुआ हैं.लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट से निर्मित सूर्य मंदिर को रथ का आकार दिया हुआ हैं. इस मंदिर में नृत्य करती हुयी कामुक मुद्राओ वाली युवतियों की मूर्तियाँ मंदिर की प्रसिद्धि का कारण हैं. कोणार्क सूर्य मंदिर को यूनेस्को द्वारा धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जा चूका हैं , मंदिर आज अपनी वास्तविक स्थिति में नहीं हैं जिसका कारण इस पर हुए हमले जिसकी वजह से मंदिर को बहुत नुक्सान हुआ, और इसके काफी हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हें, लेकिन फिर भी इसकी शिल्पकला और कारीगरी से ये आज भी प्रसिद्द हैं,रविंद्र नाथ टैगोर नेपत्थरो पर उकेरी गयी कारीगरी और शिल्पकला के लिए कहा हैं कोणार्क सूर्य मंदिर ऐसी जगह पर हैं जहा पत्थरो की भाषा इंसान की भाषा से बेहतर हैं. कोणार्क सूर्य मंदिर के इतिहास के बारे में जाने तो कृष्ण के पुत्र साम्बा को कुष्ट रोग का श्राप था, ऋषि कटक के कहने पर उसने चंद्रभागा नदी के तट पर मित्रवन के नजदीक 12 वर्षो तक सूर्य की आराधना की सूर्य की आराधना के फलस्वरूप उसका रोग ठीक हो गया तो उसने सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया.कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर अपनी वास्तुकला और शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं.

Konark Sun Temple Facts

लाल बलुए और काले ग्रेनाइट से निर्मित सूर्य मन्दिर(Konark sun temple facts) उत्कृष्ट शिल्पकला का उदहारण हैं, 24 पहियों से निर्मित 7 घोड़ो से सूर्य रथ को खींचते इस सूर्य मंदिर की भव्यता भारत ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्द हैं.आइये जानते हैं इस मंदिर से जुड़े कुछ दिलचस्प बातो को :

1कोणार्क मंदिर की भव्यता देखते ही बनती हैं , राजा नरसिंह देव द्वारा इसका निर्माण कराया गया , जिसे 1200 कलाकारों ने 12 वर्ष में पूर्ण किया.

2मंदिर के मुख्य द्वार पर मनुष्य की लोभ और लालच की गति को इंगित करता हुआ शेर विद्यमान हैं जिसके नीचे हाथी दबे हुए हैं.हठी के नीचे मनुष्य दबा हुआ हैं यहाँ शेर अहंकार और हाथी पैसे के रूप दर्शाया गया हैं.

3जो सबसे विशेष बात हैं वह यह हैं की मंदिर में चुम्बकों को इस तरह स्थापित किया गया हैं कि प्रात:काल होते ही सूर्य कि पहली किरण मंदिर मंदिर में प्रतिमा वाली जगह पर इस तरह पड़ती कि वह स्थान  हीरे की तरह चमक उठता .

4-यहाँ पर निर्मित हर पहिये को वर्तमान में घडी के अनुसार बनाया गया हैं.

places to visit in Bhubaneswar

खूबसूरत और हरे भरे वनो से घिरा हुआ भुबनेश्वर( place to visit in Bhubaneshwar) अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्द हैं, ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखे तो प्रसिद्द कलिंग युद्ध यही पर हुआ था , जिसने सम्राट अशोक को वीर योद्धा से एक बौद्ध अनुयायी बना दिया , पूर्व के काशी के रूप में विख्यात भुबनेश्वर प्रसिद्द बौद्धों का स्थान भी रहा हैं . ऐसी मान्यता हैं यहाँ 700 वर्षो में 7000 मंदिर थे..आइये जानते हैं भुबनेश्वर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों के बारे में

लिंगराज  मंदिर

भगवान त्रिभुनेश्वर को समर्पित लिंगराज का मंदिर ओडिसा की राजधानी भुबनेश्वर में स्थित हैं,शिव को समर्पित यह मंदिर ललातेडुकेसरी ने 611 -657 ईस्वी में बनाया था,उड़िया शैली को समर्पित यह मंदिर अपनी भव्य कला और सौन्दर्य के लिए विश्व में विख्यात हैं. प्राचीन कथा के अनुसार लिट्टी और वसा नमक दो राक्षसो का वध माता पार्वती ने किया था युद्ध के बाद जब उन्हें प्यास लगी तो शिव ने कूप का निर्माण कर समस्त नदियों के जल को योगदान के लिए बुलाया था. बिंदुसागर सरोवर के नजदीक ही लिंगराज मंदिर हैं. हमारी सभ्यता और संस्कृति में मंदिरो का कितना महत्वपूर्ण योगदान हैं उसका पता इस बात से चलता हैं कि मध्ययुग के दौरान यह सात हजार से अधिक मंदिर थे जो अब पांच सौ ही बचे हैं.

अपनी सुन्दर स्थापत्य कला और सौंदर्य के लिए विख्यात लिंगराज मंदिर के हर पत्थर पर सुन्दर कलाकृतिया उकेरी गयी हैं. मंदिर में देवी पार्वती की काले पत्थर की प्रतिमा हैं, गणेश कार्तिकेय और गौरी के तीन अन्य मंदिर हैं जो मुख्य मंदिर से जुड़े हुए हैं.इसके अलावा विभिन्न देवी देवताओ की सुंदर मुर्तिया विद्यमान हैं.

हीराकुंड बाँध

ओडिसा के दूसरे दर्शनीय स्थल के रूप में भुबनेश्वर से 300 किलोमीटर दूर सम्बलपुर में स्थित हीराकुंड बांध विश्व का सबसे लम्बा बाँध हैं . हीराकुंड बाँध का निर्माण 1956 में हुआ.हीराकुंड बाँध के निर्माण से ही सम्बलपुर का नाम प्रसिद्द हुआ ,विद्युत उत्पादन और सिचाई के अलावा हीराकुंड बांध से निर्मित एक मानव झील हैं जो विश्व में सबसे बड़ी मानवनिर्मित झील हैं.

इस्कॉन मंदिर

भुबनेश्वर के मध्य में स्थित इस्कॉन मंदिर(Iskcon temple) भी पर्यटन और दर्शनीय स्थल हैं , इस्कॉन में भगवान् जगन्नाथ , श्री कृष्ण , बलराम और सुभद्रा की मुर्तिया विद्यमान हैं. मंदिर के दो केंद्र हैं एक स्वर्ग धारा क्षेत्र और दूसरा नगर के बाह्य क्षेत्र में आता हैं , मंदिर में पूजा और भजन प्रतिदिन होते हैं, मंदिर में हर कार्य का बहुत शानदार तरीके से सञ्चालन होता हैं , यहाँ की प्रबंध व्यवस्था बहुत उत्तम हैं.

उदयगिरि और खंडगिरि

उदयगिरि और खंडगिरि की पहाड़िया भुबनेश्वर से 6 किलोमीटर दूर स्थित हैं. यहाँ पहाड़ियों कोकटकार गुफा बनायीं गयी हैं ,जिसमे बेहतरीन चित्रकारी की गयी हैं, प्रसिद्द चेदि वंश के राजा खारवेल ने इन गुफाओ का निर्माण जैन मुनियो के लिए करवाया था. अब यहाँ अधिकांश चित्रकारी नष्ट हो गयी हैं.

राजा रानी का मंदिर

इन्द्रेश्वर के रूप में जाना जाने वाले राजा रानी का मंदिर 11 वी शताब्दी के हिन्दू मंदिर के रूप में प्रसिद्द हैं, इस मंदिर का निर्माण लाल और पीले रंग के बलुआ पत्थर से किया गया हैं.जिसे यहाँ की भाषा में राजा रानी कहते हैं. मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं हैं मंदिर पंचाट शैली में निर्मित हैं, जो एक मंच पर निर्मित हैं.यह मंदिर अपनी शिल्पकला और प्रेम  में  आसक्त जोड़े की नक्काशी की वजह से प्रेम मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं.

मुक्तेश्वर  मंदिर

भगवन शिव को समर्पित मुक्तेश्वर का मंदिर दो वर्गों में विभाजित हैं,पहला परमेश्वर दूसरा मुक्तेश्वर ,माना जाता हैं 970 ईस्वी के लगभग इस मंदिर की स्थापना हुयी थी.इस मन्दिर तक पहुंचने के लिए लगभग 100 सीढिया पार करनी होती हैं. शिव के साथ यहाँ पार्वती , गणेश, कार्तिकेय और नंदी भी विराजमान हैं.नागर कला और कलिंग वास्तु शैली का अनोखा समन्वय यहाँ देखने को मिलता हैं, यहाँ के मंदिरो जो बेहरीन नक्काशी की गयी हैं , वही अनुपम और भव्य कला का उदहारण मुक्तेश्वर मंदिर में देखने को मिलता हैं.

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